केंद्र शासित प्रदेश (दिल्ली के लिए विशेष उपबंध)

1991 में 59 वें संविधान संशोधन विधेयक में केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली को विशेष हैसियत प्रदान की गई और इसे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली का दिया गया और लेफ्टिनेंट गवर्नर को दिल्ली का प्रशासक नामित किया गया। दिल्ली के लिए विधानसभा का मंत्रिमंडल का गठन किया गया है ।पूर्व में दिल्ली में महानगरी परिषद और कार्यकारी परिषद थी।

विधानसभा की क्षमता 70 सदस्य निर्धारित की गई है जो लोगों द्वारा प्रत्यक्ष रुप से चुने जाते हैं । चुनाव भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा कराया जाता है विधानसभा को राज्य सूची वा समवर्ती सूची के विषयों पर विधि बनाने का अधिकार है राज्य सूची के तीन विषय- लोक व्यवस्था ,पुलिस तथा भूमि को छोड़ कर परंतु संसद द्वारा बनाई गई विधि , विधान सभा द्वारा बनाई गई विधि से अधिक प्रभावी होती है।

मंत्रिमंडल की संख्या विधानसभा की कुल संख्या का 10% है। यानी मंत्रिमंडल की संख्या 7 है- मुख्यमंत्री वा अन्य मंत्री। राष्ट्रपति मुख्यमंत्री को नियुक्त करता है ना कि उपराज्यपाल। अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति मुख्यमंत्री की सलाह पर करता है। मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पर होते हैं। मंत्रिमंडल सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदाई होता है। मंत्रिमंडल मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में उप राज्यपाल द्वारा स्वविवेक से लिए गए निर्णय को छोड़कर बाकी सभी कार्यों में सहयोग व सहायता करती है लेकिन उपराज्यपाल व मंत्रिमंडल में किसी मुद्दे पर टकराव होने पर उपराज्यपाल उसे राष्ट्रपति के पास भेज सकता हैं।

ऐसी स्थिति में जब क्षेत्र का प्रशासन उपरोक्त उपबंधों के अनुसार नहीं हो पा रहा हो ,तो राष्ट्रपति उपरोक्त उपबंधों को खारिज कर सकता है और क्षेत्र के प्रशासन के लिए आवश्यक उपबंध बना सकता है। दूसरे शब्दों में संविधानिक की विफलता की स्थिति में राष्ट्रपति उस क्षेत्र में अपना शासन लागू कर सकता हैं। ऐसा उप राज्यपाल द्वारा भेजी गई रिपोर्ट के आधार पर होता है। यह उपबंध अनुच्छेद 356 के समान है जिसके तहत राज्यो  में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है।

उपराज्यपाल को सभा के सत्र में नहीं होने के दौरान अध्यादेश को प्रख्यापित करने  का अधिकार होता है। किसी अध्यादेश का प्रभाव उतना ही होता है जितना प्रभाव  सभा द्वारा पारित किसी अधिनियम का होता है। ऐसे प्रत्येक अध्यादेश को सभा ने पुनः समवेत होने के 6 सप्ताह के भीतर अवश्य अनुमोदित किया जाना होता है। वे किसी समय उस अध्यादेश को वापस भी ले सकते हैं किंतु है सभा भंग होने या  स्थगित पर किसी अध्यादेश को प्रख्यापित नहीं कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति के पूर्व अनुमति के बिना ऐसे किसी अध्यादेश को प्रख्यापित नहीं किया जा सकता है।

Posted on by