फाववाद/जंगलवाद
फाववाद कोई विशिष्ट शैली नहीं है, प्रभाववाद घनवाद या अतियथार्थवाद के समान उसके कोई पूर्ण निश्चित सिद्धान्त नही है। संयोगवश आरी मातिस को फाववाद का नेतृत्व करना पड़ा।
1905 ई0 में फ्रांस के सलोदोतान में चित्रकार मातिस के नेतृत्व में नये चित्रकारों के एक समूह ने अपने चित्रों की एक प्रदर्शनी आयोजित की।
इन नये चित्रकारों के चित्र बिल्कुल अनोखे ढंग से बनाये गये और अजीबों गरीब दिखाई देते थे। इसलिए कला समीक्षक बोक्सेल ने इन चित्रकारों को फाव (शाब्दिक अर्थ जंगली जानवर) कहकर सम्बोधित किया। अतः इन चित्रकारों की नवीन कला शैली को फाववादी कला कहा गया।
1905 ई0 की प्रदर्शनी में मातिस के अलावा ब्लामंक, आंद्रेदेरो डोनजेन, जार्जरूओ आदि नये चित्रकारों के चित्र प्रदर्शित किये गये और ये सभी फाववादी चित्रकार कहलाये।
फाव चित्रकारों के चित्रों के विषय अधिकांशतः समुद्री किनारो सार्वजनिक स्थलों, समारोहों व प्रर्यटक स्थलों के दृश्य थे।
फाववादी चित्रकार आकारों को अधिक से अधिक सरल रूप देकर चमकीले रंगों द्वारा चित्रण करते हुए भावों को उद्घाटित करना चाहते थे। इनके चित्रों में प्रतीकवादी कला की भाँति रेखाओं की अनोखी ऐठन दिखायी पड़ती है।
फाववाद कोई निश्चित कला शैली नहीं थी। इसके पूर्व निश्चित सिद्धान्त नहीं थे, बल्कि यह चित्रकला का एक क्रान्तिकारी दृष्टिकोण मात्र था। जिसके अन्तर्गत चित्रकार अपनी भावनाओं को एक अलग ढंग में विशुद्ध रंगों द्वारा व्यक्त करते थे।
सभी फाववादी चित्रकार स्वाभाविक रूप से संगीत प्रेमी थे। चित्रकार ब्लामिंक, मातिस तथा देरे चित्रकारों की दिलचस्पी प्रचलन से अलग आकर्षक पोशाक पहनने में थी। अधिकतर फाव चित्रकारों का कला अध्ययन पेरिस के एकोल द बोजार में हुआ। जहाँ पर चित्रकार कोरो एक अध्यापक थे।
1905 ई0 में- फाव कलाकारों की प्रथम प्रदर्शनी हुई तथा 1906 ई0 में दूसरी प्रदर्शनी का आयोजन किया गया।
फाववादी चित्रकार ट्यूब से रंगों को सीधे धरातल पर लगाते थे। फ्रांस में जन्मी फाववादी कला का फ्रांस के बाहर सर्वाधिक प्रभाव जर्मन कला पर पड़ा था।
फाववादी कलाकार जंगली जानवर के नाम से प्रसिद्ध हुए। दोनातेल्लो जो मूर्तिकार के रूप में जाने जाते थे, को देखकर कला समीक्षक बोक्सेल ने कहा कि- ‘‘देखो जंगली जानवरों के बीच दोनातेल्लो’’
फाववाद की 1905 ई0 में हुई प्रथम प्रदर्शनी के दो वर्ष के अन्दर उसका आरम्भिक जोश समाप्त हो गया और फाववाद के सभी चित्रकार अलग-अलग शैली में चित्रण करने लगे।