रामानुज

रामानुजाचार्य ने शंकराचार्य अद्वैत दर्शन में कुछ परिवर्तन किया तथा अपने विचारों के माध्यम से अद्वैतवाद का वयक्तिक भक्तिवाद के साथ सुंदर समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। रामानुज के लिए प्रकृति त्याज्य नहीं है वरन इसका भी महत्व है। इस अवधारणा में वह सांख्य दर्शन के निकट प्रतीत होते हैं। परंतु सांग चिंतन से उनका विचार इस प्रकार भिन्न है कि वह ब्रह्म से पृथक पर किसकी सत्ता को स्वीकार नहीं करते उन्होंने ब्रह्म जीव तथा प्रकृति एकता पर बल दिया इन अर्थों  मे बह शंकर के विपरीत सगुण वादी दिखते हैं।

निम्नांकित बातों में उनका विशिष्टाद्वैत शंकर के अद्भुत से पृथक हो जाता है- प्रथम शंकर की तरह वे या नहीं मानते कि जीव और ब्रह्म तत्व था और मूलतः एक हैं वरन ब्रह्म एवं जिओ की एकता को स्वीकार करते हुए भी उन्होंने दोनों के मध्य थोड़ा सा अंतर रखा है उनके विचार में ब्रह्म द्रव्य है जो जीव गुण है।

ब्रह्म अगर असीमित है तो जीव सीमित है दूसरे शंकर जीव की मुक्ति के लिए ज्ञान पर अत्यधिक बल देते हैं यद्यपि रामानुज ने विज्ञान की महत्ता को स्वीकार किया है फिर उनका विशेष बल भगवत अनुग्रह यानी ईश्वर की कृपा कर रहा है यहीं से उनका प्राप्ति बाद का चिंतन विकसित होता है रामानुज निर्जीव के मुक्ति ब्रम्ह में लीन हो जाने में नहीं माना है बल्कि उन्होंने माना है कि जीव की मुक्ति ब्रम्ह में लीन होने में नहीं बल्कि उनके निकट रह कर उस निकटता के आनंद को महसूस करने में है इस प्रकार रामानुज ने अद्भुत चिंतन तथा भक्ति आंदोलन के मध्य सेतु का कार्य किया।

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