राजनीति का गिरता स्तर

जगमोहन सिंह राजपूत ने परिपक्वता से परे हटते हुए राजनीति में जिस राजनीतिक परिपक्वता का मुद्दा उठाया है वह देश के गिरते राजनीतिक स्तर और देशवासियों की सहमति राजनीतिक सोच को उद्घाटित कर रहा है।

आज किसी भी नेता या आम नागरिक के लिए देश के संवैधानिक पद पर बैठे हुए किसी भी सम्मानित व्यक्ति के विरुद्ध अपमानजनक टिप्पणी कर देना आम बात हो गई है देश के प्रधानमंत्री की सही बात को भी अपने हिसाब से व्याख्यायित करके प्रचारित करना अब विपक्षी राजनीतिक का स्वभाव बन चुका है। ऐसे में देश के भ्रमित जनमानस की सिमटती राजनीतिक सोच से जो नुकसान हो रहा है वह राजनीतिक शुचिता के लिए घातक है दूसरी ओर वोट बैंक की दूषित राजनीति ने भारतीय समाज को जाति धर्म और संप्रदाय के खेमे में बैठकर जिस सामाजिक भी खराब को जन्म दिया है उससे देश में जातिवाद और संप्रदाय का जहर घुल रहा है। भला ऐसे देश को सही राजनीतिक दिशा देने की जिम्मेदारी का निर्वाह करेगा।

Posted on by