भारत में अंग्रेजी वित्त पूंजी का निवेश

भारत में ब्रिटिश पूंजी निवेश विकास का नहीं, अपितु शोषण के साधन के रूप में प्रकट हुआ। मुख्य रूप से यह विदेशी पूंजी 1857 ई. के बाद निवेशित हुई। 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में यह भिन्न भिन्न दशाओं में निवेशित हुई और 20वीं शताब्दी में इसने अपनी जकड़ अधिक कर ली।

भारत में ब्रिटिश पूंजी निवेश के दो रूप थे - 

1-: भारत सचिव द्वारा भारत सरकार तथा अर्ध - सार्वजनिक निकायों की ओर से इंग्लैंड में प्राप्त किए ऋण, जो प्रायः रेलवे, सिंचाई साधन, बंदरगाहों के विकास और जल विद्युत परियोजनाओं में निवेश किए गए।

2-:  विदेशी व्यापारिक निवेश मुख्य रूप से यह निवेश उन साधनों में किया गया जो भारत के प्राकृतिक शोषण में सहायक हो सकते थे। अतः यह निवेश भारत के आर्थिक शोषण का ही एक रूप था, न कि भारत के औद्योगिक विकास हेतु किया गया प्रयत्न।

अनौद्योगीकरण -:

अंग्रेजों द्वारा भारत को जान - बूझकर कृषि प्रधान देश बनाए रखने करने का प्रयास किया गया, ताकि ब्रिटिश उद्योगों के लिए कृषि संबंधी कच्चा माल सस्ते मूल्य पर प्राप्त होता रहे। इस कारण भारत को औद्योगिक क्रांति के लाभों में वंचित रखा गया। एक ओर तो यूरोपीय देशों में दस्तकरियों के पतन के बाद आधुनिक उद्योगों में रोजगार प्राप्त हुए, वहीं दूसरी ओर भारत में दस्तकारियों‌ के पतन के कारण बेरोजगारी बढ़ती गई  धनोपार्जन के साधन सीमित होने से लोगों की जीविकोपार्जन की स्थिति बड़ी दयनीय हो गई। बेरोजगार, कृषि की ओर अग्रसर हुए, जिससे कृषि पर जनसंख्या का दबाव बढ़ता गया।

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