आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन (भाग -I)

ब्रिटिश शासन की स्थापना से भारत में व्यापक और मूलभूत रूप में राजनीतिक, प्रशासनिक एवं वैधानिक एकीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। भारतीय इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ। ब्रिटिश शासन ने भारतीयों में सामूहिक चेतना का संचार ही नहीं किया, अपितु उन्हें अपने सामान्य हितों एवं सुख दुख के प्रति भी सजग बनाया।

ब्रिटिश शासन के दौरान नई सामाजिक अर्थव्यवस्था , नए ढंग की राज्य प्रणाली एवं राज्य के प्रशासनिक तंत्र की स्थापना तथा नई दिशा के प्रसार के फलस्वरूप भारत में नए सामाजिक वर्गों का उदय हुआ। इन नए सामाजिक वर्गों का उदय मुख्यतः ब्रिटिश सरकार के विभिन्न अधिनियमों, विदेशी पूंजीवादी राज्यों का वाणिज्यिक एवं अन्य शक्तियों के भारतीय समाज पर बढ़ते दबावों तथा भारत में आधुनिक उद्योगों की स्थापना के फलस्वरूप हुए मूलभूत आर्थिक परिवर्तनों के कारण हुआ। ग्रामीण क्षेत्रों में जमींदारों, असामियों, किसानों तथा भूमिहीन श्रमिक वर्गों के साथ ही आधुनिक साहूकारों और व्यापारिक समूहों का भी उदय हुआ, जो किसान किसानों और बाज़ार के मध्य बिचौलियों का कार्य करते थे, क्योंकि दूरस्थवासी भू - स्वामी तो केवल लगान वसूलने में ही रुचि रखते थे। शहरी क्षेत्रों में बुर्जुवा तथा कामगार वर्गों के उदय के साथ अनेक व्यावसायिक वर्गों का उदय हुआ, जिनमें वकील, डॉक्टर, शिक्षक, प्रबंधक, लिपिक, वैज्ञानिक तथा अभियंता, पत्रकार आदि शामिल थे। आधुनिक उद्योग कृषि, वाणिज्य, वित्त, प्रशासन, शिक्षा, प्रेस, तथा नए सामाजिक जीवन के अन्य क्रिया - कलापों से जुड़े हुए ऐसे सामाजिक समूह ब्रिटिश - पूर्व समाज से अपरिचित थे, क्योंकि  समय ऐसी सामाजिक, आर्थिक एवं वर्ग प्रणाली अस्तित्व में नहीं आई थी।

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