1757 से 1853 तक सामाजिक परिवर्तन स्पष्टता परिलक्षित होने लगे थे और इस काल में इनकी गति तेज गई। इस कालविधी में भारत के विभिन्न प्रदेशों का आपसी संपर्क बढ़ने लगा तथा सामाजिक समूहों का पुराना धार्मिक ढांचा विघटित होने लगा। जाति - प्रथा शितिलता आई तथा पारंपरिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था ने आत्मनिर्भरता तथा अलगाव के अपने अत्यंत प्राचीन लक्षणों को खो दिया। प्राचीन वर्गों में विभाजित भारतीय समाज में नए वर्गों का उदय हुआ। इनमें आर्थिक, शैक्षिक तथा पेशे एवं व्यवसायगत विभिन्नताओं के होने पर भी कुछ सामान्य विशेषताएं भी थीं, जो इन्हें एक सामूहिक वर्ग का ही दर्शाती थीं। इस नए वर्ग को मध्यम वर्ग का नाम दिया गया, हालांकि यह वर्ग अपने उद्भव, संरचना तथा दृष्टिकोण में पश्चिम के माध्यम वर्ग, बुर्जुवा वर्ग से भिन्न था। आधुनिक मध्यम वर्ग का विकास हुआ। आधुनिक भारतीय मध्यम वर्ग सर्वप्रथम मद्रास, बंबई, कलकत्ता तथा उन नगरों में उभरा को ब्रिटिश वाणिज्यिक गतिविधियों तथा प्रशासन का केंद्र बन गए थे। शिक्षित समुदाय इसी वर्ग का अगुवा था।
भारत में आधुनिक उद्योगों की स्थापना और अद्योगिक बूर्जुआ वर्ग के अस्तित्व में आने से भी दशकों पूर्व आधुनिक बुद्धिजीवी वर्ग विकसित हो चुका था। राजाराम मोहन राय और उनके अनुयायियों ने ऐसे पहले बुद्धिजीवी वर्ग का गठन किया, जिन्होंने पाश्चात्य संस्कृति का अध्ययन करते हुए उसके बुद्धिवादी एवं प्रजातांत्रिक सिद्धांतों , धारणाओं तथा भावनाओं आत्मसात किया। ब्रिटिश सरकार की स्थापना के बाद अधिकाधिक स्कूलों एवं कॉलेजों, धर्म प्रचारकों एवं प्रबुद्ध भारतीयों के निजी प्रयत्नों ने इस दिशा में और अधिक प्रगति हुई। फलस्वरूप 19वी शताब्दी के उत्तरार्ध में शिक्षित भारतीयों के एक बड़े वर्ग का विकास हुआ और इसी से एक बड़े बुद्धिजीवी वर्ग का उदय हुआ।