अमृता शेरगिल (1913 ई0 से 1941 ई0)
जन्म:- 30 जनवरी सन् 1913 ई0 (बुडापेस्ट हंगरी) मृत्यु:- 5 दिसम्बर सन् 1941 ई0 (लाहौर पाकिस्तान)
माता व पिता:- पिता- उमराव सिंह शेरगिल (भारतीय) (सिक्ख जमींदार)
माता- मारिया आन्तवानेत गोरसमन (हंगेरियन)
शिक्षा:- आपने मेजर विटमार्श तथा बैवेन पेटमन से प्रारम्भिक कला शिक्षा ली। 1924 ई0 में इटली गयी जहाँ फ्लोरंेस में कला शिक्षा ली।
1929 ई0 से 1934 ई0 में अमृता ने पेरिस कला महाविद्यालय वियोक्स आर्ट्स में कला की विधिवत शिक्षा ली और प्रसिद्ध कला शिक्षक ल्यूसिन सिमोन के निर्देशन में कार्य किया।
पेरिस में ग्रां शोमिएर तथा एकोल-दे-बोजार में कला अध्ययन किया। और प्रथम बार तैल रंगों का प्रयोग किया तथा लगभग 60 चित्र बनायें।
लेखन कार्य:- आपने आर्ट एण्ड एप्रियेशन एंव इंडियन आर्ट टूडे तथा टेन्ड्स आॅफ आर्ट इन इंडिया पर अपने विचार लिखे जो कला प्रेमियों ने बहुत सराहा।
पुरस्कार:- वर्ष 1932 ई0 में टोरसो पर ग्राद सेलो पुरस्कार एंव सम्मान प्राप्त हुआ। बाद में वे ग्राद सेलो की एसोसिएट भी बनायी गयी।
प्रमुख चित्र:-
पर्वतीय पुरूष पर्वतीय स्त्रियाँ ब्रह्मचारी बाजार
बधु का श्रृंगार फल बेचने वाला पोट्रेट आॅफ माई फादर मदर इंडिया
हिल मैन ग्राम्या दृश्य तीन बहनें बोलती आँखें
हिल ओमेन (भूख की त्रासदी व्यक्त करते है) आदि।
अन्य:- यूरोप भ्रमण के दौरान- पिकासो, ब्राक, मातिस और गोगां के चित्रों से प्रेरणा ग्रहण की।
गोगां की ताहिती कला ने अमृता को सर्वाधिक प्रभावित किया।
बालिका वधू एंव अछूत बालिका नामक चित्रों में गांेगा की ताहिती कला का प्रभाव दिखायी देता है।?
सन् 1934 ई0 में भारत लौटने पर शिमला के समीप ही समर हिल पर एक छोटा सा स्टूडियो बना लिया।
भारत मंे अमृता को नन्दलाल एंव रवीन्द्र्रनाथ की कला ने भी प्रभावित किया।
नव प्रभाववादी कलाकार सेजान से प्रकृति घनत्व को समझा और गाँगिन ने इन्हें भारतीय रंगों का नाटकीयता के साथ प्रयोग करना सिखाया।
बम्बई के ताज होटल में उन्होंने चित्रों की प्रदर्शिनी की।
प्रदर्शिनी:- सन् 1934 ई0 में इलाहाबाद (एकल प्रदर्शिनी) इसके अलावा- दिल्ली, लाहौर, मुम्बई, हैदराबाद और शिमला में भी कला प्रदर्शिनी किया।
चित्र संग्रह:- अमृता के लगभग 30 चित्र राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय नई दिल्ली में सुरक्षित है। एवं इनके चित्र श्रीमती इन्दिरा सुन्दरम् के निजी संग्रह में भी है।
नोट:- 1. अमृता शेरगिल अपने चित्रों के माध्यम से भारत की आत्मा को खोजने का प्रयास किया।
2. लाल रंग आपको विशेष प्रिय था, जिसके अनेक वलो व रंगतों का प्रयोग अपने चित्रों में किया है।
आपकी कला में पाॅल गागिन की शैली की आदिम सरलता, पाल सेजा की शैली की गठनशीलता व सरलीकृत आकार तथा वानगो की अभिव्यंजना शक्ति के साथ भारतीय कला के प्रत्येक पक्ष का प्रभाव भी है।
जैसे- कुषाण कालीन मथुरा मूर्तियों से प्रभावित वस्त्र योजना, अजन्ता के संयोजन, केरल के भित्ति चित्रों की प्रकाशकीय घनता व आरेखन तथा बसोहली शैली की रंग योजना आदि विषय की दृष्टि से आपने भारतीय जनजीवन व प्राकृतिक दृश्यों को महत्व दिया।
1924 ई0 से 1929 ई0 के मध्य आपने भारत प्रवास के मध्य रेखांकन तथा जलरंग चित्रण किया, जिनमें यूरोपीय प्रभाव था। रेखाएं बारीक तथा अशक्त थी। चित्रों में भी उदासीनता नारी आकृतियाँ तथा तनावग्रस्त आकृतियाँ महत्वपूर्ण थी।
इसी समय आपने माॅडल्स बिठा कर चित्रण किया, जिससे शैली में परिष्कार आपा तथा 1929 ई0 में आप पेरिस चली गयी।