वांणिकवादी विचारधारा के अनुसार आर्थिक निकास या धन का निकास उस समय होता है, जब किसी देश के प्रतिकूल व्यापार संतुलन के फलस्वरूप सोने और चांदी का निकास होता है। इंग्लैंड का भारतीय अर्थव्यवस्था एक एकाधिकार स्थापित होने के बाद भारतीय धन ( सोने और चांदी ) का इंग्लैंड की ओर प्रवाह होने लगा। 1831 ई. के पश्चात इस आर्थिक निकास ने "अप्रितफल" निर्यात का रूप धारण कर लिया। प्रारंभ के कुछ अपवादित विषयों को छोड़कर भारत का इंग्लैंड के साथ द्वितीय महाबुद्ध तक प्रतिकूल व्यापार संतुलन ( unfavour-able balance of trade) ही बना रहा। भारत से इंग्लैंड की ओर धन के प्रवाह के प्रमुख तत्व निम्नलिखित थे - कंपनी के भागीदारों को दिया जाने वाला लाभांश विदेशों से लिए गए सार्वजनिक ऋणों के भुगतान के रूप में, सैनिक तथा असैनिक व्यय के रूप में, इंग्लैंड में भंडार वस्तुओं की खरीद के रूप में, विदेशी पूंजी निवेश पर दिया जाने वाला ब्याज और लाभांश, विदेशी बैंकों बीमा और नौवहन कंपनियों को प्राप्त धन आदि।
दादाभाई नौरोजी ने भारत से इंग्लैंड की ओर धन के इस प्रवाह को " अनिष्ठों का अनिष्ठ " (Evil of all Evil) की संज्ञा दी। उन्होंने इस प्रवाह को भारत की निर्धनता का प्रमुख कारण माना।