बौद्व धर्म ने वर्ण व्यवस्था और जाति प्रथा का विरोध किया।
बौद्व धर्म में प्रविष्ट होने को उपसम्पदा कहा जता है। बौद्व धर्म के त्रिरत्न बुद्व, धम्म एवं संघ है।
प्रथम बौद्ध संगति 483 ई0पू0 में राजगृह (सप्तपर्णि गुफा) अजातशत्रु के शासन काल में महाकस्सप की अध्यक्षता में हुयी। इसमें बुद्ध के दो शिष्य आनन्द और उपालि उपस्थित थे। आनन्द तथा उपालि क्रमशः धर्म और विनय के प्रमाण माने गये।
द्वितीय बौद्ध संगति 383 ई0पू0 में वैशाली में कालाशोक के शासन काल में सर्वकामि की अध्यक्ष़्ाता में हुयी इसी में बौद्व धर्म स्थविर एवं महासंघिक में विभाजित हो गया।
तृतीय बौद्ध संगति 251 ई0पू0 अशोक के शासन काल मोग्गालिपुत्ततिस्स की अध्यक्षता में पाटिलपुत्र में हुयी थी। इसी में अभिधम्मपिटक नामक तीसरा पिटक जोड़ा गया। मोग्गलिपुत्र तिस्स ने कथावस्तु को संकलन किया।
चतुर्थ बौद्व संगति-कनिष्क के शासन काल में कश्मीर के कुण्डलवन में हुयी थी जिसकी अध्यक्षयता बसुमित्र ने की एवं उपाध्यक्ष अश्वघोष थे। बुद्व ने मध्यम मार्ग का उपदेश दिया। इसमें बौद्ध धर्म हीनयान और महायान में विभाजित हो गया। वसुमित्र ने विभाषाशास्त्र नामक ग्रंथ की रचना किया।
-शेष अगले भाग में