भगवान शिव की पूजा करने वाले को शैव एवं शिव से सम्बन्धित धर्म को शैवधर्म कहा जाता है। लिंग पूजा का उल्लेख मत्स्य पुराण में मिलता है। शिव की प्राचीनतम मूर्ति पहली शताब्दी ई0पू0 रेनीगंुटा (मद्रास) से प्रसिद्ध गुडिमुल्लमलिंग के रूप में प्राप्त हुई।
वामन पुराण में शैव सम्प्रदाय की संख्या चार बतायी गयी है-1. पाशुपत 2. कापालिक 3. कालमुख 4. लिंगायत
पाशुपत सम्प्रदाय सबसे प्राचीन सम्प्रदाय है इसके संस्थापक लकुलीश थे। लकुलीश का जन्म कायारोहण (गुजरात) में हुआ था। पाशुपत सम्प्रदाय के अनुयायिओं को पंचार्थिक कहा जाता है।
भवभूति का मालती माधव नाटक इसका प्रमुख ग्रंथ है।
कापालिक सम्प्रदाय के इष्ट देव भैरव थे इस सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र श्री शैल नामक स्थान था।
कालामुख सम्प्रदाय के अनुयायियों को शिवपुराण में महाव्रत धर कहा गया है।
इस सम्प्रदाय के लोग नर कपाल में भोजन, जल तथा सुरापान करते थे और साथ ही साथ शरीर पर चिता की भस्म मलते थे।
वासव पुराण में लिंगायत सम्प्रदाय के प्रवर्तक अल्लभ प्रभु तथा उनके शिष्य वासव को माना जाता है।
लिगांयत सम्प्रदाय दक्षिण में प्रचलित था इसमें गुरू, जंगम और लिंग का बहुत महत्व है।
इस सम्प्रदाय को वीर शैव सम्प्रदाय भी कहा जाता हैं।
10वीं शताब्दी में मत्स्येन्द्रनाथ ने नाथ सम्प्रदाय की स्थापना की इस सम्प्रदाय की व्यापक प्रचार-प्रसार बाबा गोरखनाथ के समय हुआ।
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