प्राचीन भारतीय इतिहास-34 मगधराज का उत्कर्ष

मगधराज का उत्कर्ष

हर्यक वंश (पितृहंता वंश-5440पू0 से 4120पू0)-सोलह महाजनपदों में से मगध महाजनपद का आविर्भाव एक साम्राज्य के रूप हर्यंक वंश के शासकों के काल मे ंहुआ।

      बिम्बिसार इस वंश का प्रथम शक्तिशाली शासक था। बिम्बिसार मगध की गद्दी पर 5440पू0 में बैठा। पुराणों के अनुसार मगध पर सर्वप्रथम ब्रार्हद्रथ वंश का शासन था। इसी वंश का राजा जरासंघ था जिसने गिरिब्रज को अपनी राजधानी बनाया था। मगध साम्राज्य की महत्ता का वास्तविक संस्थापक बिम्बिसार था। जैन साहित्य में इसे श्रेणिक कहा गया है।

      बिम्बिसार ने अंग राज्य को जीतकर मगध साम्राज्य में मिलाया था और अपने पुत्र अजातशत्रु को वहाँ का शासक नियुक्त किया।

      बिम्बिसार ने  गिरिब्रज (राजगृह) को अपनी राजधानी बनाया था विम्बिसार ने मगध राज्य पर 52 वर्ष तक शासन किया।

      बिम्बिसार ने राजवैद्य जीवक को अवन्ति नरेश चण्डप्रद्योत के राज्य में चिकित्सार्थ भेजा था।

      बिम्बिसार महात्मा बुद्ध का समकालीन था। ़

      बिम्बिसार बौद्व एवं जैन दोनों मतों का पोषक था।

      बिम्बिसार की हत्या करके उसका पुत्र अजातशत्रु मगध की गद्दी पर बैठा।

      अजातशत्रु का उपनाम कुणिक था।

      अजातशत्रु ने 32 वर्ष तक शासन किया।

      वह जैनधर्म का अनुयायी था।

      अजातशत्रु के मंत्री वस्सकार द्वारा वैशाली के लिच्छवियो मंे फूट डालने के कारण अजातशत्रु को वज्जी संघ पर विजय प्राप्त हुयी।

      अजातशत्रु की हत्या कर उसका पुत्र उदायिन मगध की गद्दी पर बैठा।

      उदयन ने पाटलिपुत्र नगर की स्थापना की तथा राजगृह के स्थान पर उसे अपनी नई राजधानी बनायी।

      उदयन भी जैनधर्म का अनुयायी था।

      हर्यंक वंश का अन्तिम राजा उदयन का पुत्र नागदशक था। इसका एक नाम दर्शक (कथाकोष) की था।

      नागदशक को उसके आमात्य शिशुनाग ने 4120पू0 में अपदस्थ करके मगध पर अधिकार कर शिशुनाग नामक नये वंश की स्थापना की।

-शेष अगले भाग में

 

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