सामाजिक - धार्मिक सुधारवादी आंदोलनों का स्वरूप

18वीं तथा 19वीं शताब्दी के दौरान भारत में ब्रिटिश सत्ता के विस्तार के दौरान भारतीय रीति - रिवाजों तथा संस्थाओं का प्रचलन स्पष्टता परिलक्षित होता है। भारत में औपनिवेशिक शासन के विस्तार के साथ साथ नए बुद्धिजीवी वर्ग का उदय हुआ, जिसने पश्चिम की उदारवादी संस्कृति अपनाई तथा प्राचीन काल से चली आ रही सामाजिक संस्थाओं तथा धार्मिक दृष्टिकोण में सुधार लाने के लिए आंदोलन चलाने की आवश्यकता पर बल दिया। वे पुराने परंपरागत सामाजिक ढांचे के भीतर व्याकुलता का अनुभव कर रहे थे।

परिवर्तन के प्रतीकों के माध्यम से सुधार -: यह प्रवृत्ति गैर - मतावलंबी व्यक्तिगत गतिविधि द्वारा प्रकट हुई, जो जो केवल 'युवा बंगाल' या डरोजिया के आंदोलन तक सीमित थी। इन्होंने सुधार आंदोलन के भीतर उग्रधारा का प्रतिनिधित्व किया। 

सामाजिक कार्यों के माध्यम से सुधार -: यह प्रवृत्ति विशेषता दयानंद सरस्वती के आर्यसमाज, रामकृष्ण मिशन और स्वामी विवेकानन्द और महाराष्ट्र में प्रार्थना समाज के क्रिया - कलापों में दिखाई दी। महाराष्ट्र में गोपालहरी देशमुख सामान्यता लोकहितवादी के रूप में प्रसिद्ध थे। उनके लिए समाज सुधार कार्यों के लिए धर्म की स्वीकृति का होना या ना होना कोई अर्थ नहीं रखता था।

मुस्लिम समुदाय में सुधार आंदोलन -: जहां तक मुस्लिम समुदाय में सुधार आंदोलनों का संबंध है, इस दृष्टि से इसमें कोई अंतर नहीं है क्योंकि ये आंदोलन एक दूसरे से मूलतः भिन्न थे। अलीगढ़ और अहामदिय आंदोलन मुस्लिमों में अधिकार उदारवादी आदशों के पथ - प्रदर्शक थे।

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