एक्रैलिक चित्रण
एक्रैलिक रंगों का विकास 1920 ई0 के आस-पास माना जाता है।
यह किसी रंग पदार्थ का एक विशेष प्रकार के सिन्थैटिक रेजिन के बंधक में तैयार किया गया रंग है।
एक्रैलिक रेजिन का निर्माण एक्रैलिक और मेटा क्रैलिक अम्लों से होता है।
एक्रैलिक रंग तथा एक्रैलिक माध्यम दोनों पानी में घुलनशील होते है, तथा इन्हें पतलपा करने के लिए पानी मिलाया जाता है।
एक्रैलिक चित्रण के लिए ऐसी सतहों का प्रयोग किया जाता है, जिस पर रंगों का थोड़ा अंश शोषित हो सकता है। जैसे- जूट का कैनवास, लकड़ी, हार्डबोर्ड, स्ट्राबोर्ड, कागज, भित्ति इत्यादि।
तैलीय सतहों पर एक्रैलिक रंगों का प्रयोग नही करना चाहिए।
कैनवास पर एक्रैलिक रंगों को लगाने से पूर्व प्राइमर लगा देना चाहिए अन्यथा रंग छूट जाता है।
सफेद प्लास्टिक की पैलेट एक्रैलिक रंग के लिए अधिक उपयोगी होते है, तथा लकड़ी की प्लेट की तुलना में प्लास्टिक की पैलेट पर रंग आसानी से छुटाये जा सकते है।
एक्रैलिक रंग की प्रकृति जलरंग, ग्वाश, टेम्परा के अधिक समीप है।
एक ही चित्र में ग्लेज तथा अपारदर्शक रंगों का साथ-साथ प्रयोग आकर्षक टैक्सचर प्रभाव उत्पन्न करता है।
एक्रैलिक रंगों में सूखे व्रश (ड्राईव्रश) तकनीक का प्रयोग किया जा सकता है।
एक्रैलिक रंगों को वार्निश करने की आवश्यकता नही होती।
एक्रैलिक चित्रों को साफ करने के लिए पानी में साबुन के हल्के घोल का प्रयोग किया जाता है।