पहाड़ी चित्रकला

                                पहाड़ी चित्रकला

    यह शैली पहाड़ी राज्यों में पनपी एंव विकसित हुयी। ये पहाड़ी राज्य सिंधु घाटी से लेकर गंगा नदी के उद्गम स्थल तक फैले हुए थे। 19वीं और 20वीं शदी ई0 में इस क्षेत्र में प्राप्त लघु चित्रों से भारतीय लघुचित्र कला के इतिहास में एक नवीन अध्याय जुड़ा, प्रारम्भ में इसे कांगड़ा शैली, गुलेर शैली, बसौली शैली आदि नामों से जाना गया। किन्तु अन्ततः इन सभी के लिए पहाड़ी कलमध्पहाड़ी शैली नाम उपयुक्त माना गया।
    17वीं शदी के उत्तरार्द्ध में प्रस्फुटित पहाड़ी शैली का सर्वांगीण विकास 18वीं शदी के उत्तरार्द्ध में हुआ। और 19वीं शदी ई0 में यह शैली अपने विकास के चरमोत्कर्ष पर पहुँच गयी।
    पहाड़ी शैली की खोज सर्वप्रथम चाल्र्स मैटकाफ ने कांगड़ा नामक स्थान पर किया था। इसके बाद आनन्द कुमार स्वामी, ओ0सी0 गांगुली, जे0सी0 फ्रेंच, डब्ल्यू जी0 आर्चर, एम0एस0 रन्धावा, एन0सी0 मेहता, कार्लखण्डालवाला, मुल्कराज आनन्द आदि ने इस शैली पर अध्ययन और लेखन कार्य किया।
    आनन्द कुमार स्वामी ने 1910 ई0 में इलाहाबाद में कागड़ा शैली के कुछ चित्रों को प्रकाशित कर इस ओर कलाविदों का ध्यान आकृष्ट किया। 1916 ई0 में स्वामी जी की पुस्तक राजपूत पेंटिंग प्रकाशित हुयी। इसमें स्वामी जी ने पहाड़ी चित्रों को राजस्थानी चित्रों से भिन्न मानते हुए पहाड़ी चित्रों को हिन्दू पेंटिंग्स आॅफ पंजाब हिमालयाज कहकर सम्बोधित किया।
    1926 ई0 में ओ0सी0 गांगुली ने पहाड़ी चित्रकला पर मास्टर पीसेज आॅफ राजपूत पेंटिंग नामक पुस्तक प्रकाशित की।
    1952 ई0 में डब्ल्यू जी0 आर्चर ने कागड़ा पेंटिंग्स और 1973 ई0 में इण्डियन पेंटिंग्स इन द पंजाब हिल्स दो खण्डों में प्रकाशित किया। 
    1954 ई0 में एम0एस0 रन्धावा ने कांगड़ा वैली पेंटिंग लिखा। 1956 ई0 में कृष्णा लीजेन्ड इन पहाड़ी पेंटिंग एंव 1958 ई0 में बसोहली पेंटिंग प्रकाशित की।
    नेशनल म्यूजियम नई दिल्ली ने एम0 एस0 रन्धावा द्वारा संकलित चित्रों के आधार पर कांगड़ा पेंटिंग आॅफ द भागवत् पुराण कागड़ा पेंटिंग आॅफ द गीत गोविन्द, कांगड़ा पेंटिंग आॅफ द विहारी सतसई, कांगड़ा पेंटिंग आॅफ द रागमाला और कांगड़ा पेंटिंग आनलव प्रकाशित किया।
    1964 ई0 एन0 गोस्वामी जो कि पहाड़ी चित्रकला के विद्वान है, का मानना है कि पहाड़ी चित्रकला मुगल दरबार से भागे चित्रकारों के बल पर नहीं, अपितु गुलेर वासी चितेरा पंडित शेऊ के वंशजों के बल पर पली बढ़ी।
    एम0एस0 रन्धावा का मानना है कि पहाड़ी चित्रकला का विकास मुगल चित्रकारों के द्वारा किया गया। रन्धावा ने लिखा है कि कला (पहाड़ी) दिल्ली के मुगल दरबार के दुर्गन्धमय, सड़ान्ध युक्त वातावरण से कला निकलकर पहाड़ियों की स्वच्छ वायु में पहुँच गयी।
    वास्तव में पहाड़ी चित्रकला के विकास में मुगल और राजस्थानी शैलियों का योगदान रहा। इन दोनों शैलियों के सहयोग से पहाड़ों के विविध स्थानों पर निजी विशेषताओं के साथ कला विकसित हुयी, जिनमें प्रमुख स्थान निम्न है-
1.    बसौली 
2.    गुलेर
3.    कांगड़ा
4.    कुल्लू
5.     चंबा
6.    मण्डी
7.    गढ़वाल आदि।
 

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