जयपुर शैली का योग 1600 से 1900 ईसवी तक माना जाता है ।इस शैली के अनेक चित्र शेखावटी में 18वीं शताब्दी के मध्य हुआ उत्तरार्ध में भित्तिचित्रों के रूप में बने हैं। इसके अतिरिक्त सीकर ,नवलगढ़, रामगढ़ और मुकुंदगढ़ इत्यादि स्थानों पर भी इस शैली के भेद चित्र प्राप्त होते हैं । जयपुर शैली के चित्रों में भक्ति तथा श्रंगार का सुंदर समन्वय मिलता है । कृष्ण लीला राग-रागिनी, रासलीला के अतिरिक्त शिकार तथा हाथियों की लड़ाई के अद्भुत चित्र बनाए गए हैं । विस्तृत मैदान ब्रिज मंदिर के शिखर अष्वरोही आदि प्रधान रूप में चित्रित है।
इस समय के चित्रों में मुगल कला के प्रभाव की मीनारों व विस्तृत सेल मालाओं का खुलकर चित्रण हुआ है ।जयपुर के कलाकार उद्दान चित्रण में भी अत्यंत दक्ष थे । वह दोनों में भांति- भांति के वृक्षों ,पक्षियों तथा बंदरों का सुंदर चित्रण किया गया है । मानव आकृतियों में स्त्रियों के चेहरे गोल बनाए गए हैं। नारी पात्रों की चोली ,कुर्ती ,दुपट्टा ,गहरे रंग का घेरदार लहंगा तथा कहीं-कहीं जूती पहने चित्रित किया गया है । पतली कमर, नितंब तथा झूलती वेगी, पांव में पायल ,माथे पर टीका ,कानों में बालियां, मोती के झुमके, हार, असली बाजू में बाजु बंद, हाथों में चूड़ी आदि आभूषण मुगल प्रभाव से युक्त हैं।
स्त्रियों की भांति पुरुषों को भी सुसज्जित किया गया है । पुरुषों को कलंगी लगी पगड़ी ,कुर्ता ,जामा ,अंगरखा , ढीली डोरी का पायजामा, कमरबंद पटका तथा नोकदार जूता पहनने चित्रित किया गया है । चित्रों में हरा रंग प्रमुख हास्य लाल रंग से भरे गए हैं । जिनको बेलवटो से सजाया गया है । लाल ,पीला ,नीला तथा सुनहरे रंगों का बाहुल्य है।