रॉलेट कानून, 1919

भारत सरकार भारतीयों को संतुष्ट करने का प्रयास करते समय भी दमन के लिए तैयार थी। युद्ध के पूरे काल में राष्ट्रवादियों का दामन, उन्हें जेलों में बंद करना तथा फांसी पर लटकाना जारी रहा। मार्च, 1919 में सरकार ने रॉलेट एक्ट पास किया, 10 सितंबर 1917 ई. को ब्रिटिश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में भविष्य में आतंकवाद को रोकने तथा कानूनी सुधारों की रूपरेखा तैयार करने के लिए सेडिशन कमिटी गठित की गई। इसमें दो सदस्य भारतीय उच्च न्यायालयों से भी थे जिनमें एक भारतीय था। 1918 ई. में इसने सरकार को निम्नलिखित रिपोर्ट सौंपी - 

* नागरिक अधिकारों पर लगे युद्धकालीन प्रतिबंध स्थाई किया गया।

* प्रतिबंधित पुस्तकों के भंडारण एवं वितरण पर गिरफ्तारी ।

* मुकदमे की सुनवाई विशेष अदालत में हो तथा उसमें अपील का अधिकार न दिया जाए।

* साक्ष्य विधि के अन्तर्गत अवैध साक्ष्यों को भी मान्यता दी गई।

इस प्रकार रॉलेट एक्ट एक काला कानून था जिसकी घोषणा थी " कोई अपील नहीं, कोई दलील नहीं तथा कोई वकील नहीं।" सरकार ने व्यापक विरोध के बावजूद 21 मार्च , 1919 को इसे कानूनी रूप दे दिया।

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