बढती जनसँख्या के कारण अन्न उत्पादन के लिए जंगलो का सफाया होता जा रहा है , लकड़ियाँ इंधन के रूप में प्रयोग की जा रही है जिससे हानिकारक गेसे में वृद्धि होती जा रही है कार्बन डाईऑक्साइड , मीथेन तथा क्लोरो – फ्लोरो कार्बन की अधिकता से दिन प्रतिदिन धरती गर्म होती जा रही है जलवायु गर्म होने का एक और कारण प्राकर्तिक संसाधनों जैसे – कोयला , खनिज तेल आदि का उघोगो में प्रयोग भी है | ओद्दोगिकीकरण के अँधा धुंध विकास से वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड के मात्र में भारी वृद्धि हो रही है|
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, धरती के वातावरण के तापमान में लगातार हो रही विश्वव्यापी बढ़ोतरी को 'ग्लोबल वार्मिंग' कहा जा रहा है। हमारी धरती सूर्य की किरणों से उष्मा प्राप्त करती है। ये किरणें वायुमंडल से गुजरती हुईं धरती की सतह से टकराती हैं और फिर वहीं से परावर्तित होकर पुन: लौट जाती हैं। धरती का वायुमंडल कई गैसों से मिलकर बना है जिनमें कुछ ग्रीनहाउस गैसें भी शामिल हैं। इनमें से अधिकांश धरती के ऊपर एक प्रकार से एक प्राकृतिक आवरण बना लेती हैं जो लौटती किरणों के एक हिस्से को रोक लेता है और इस प्रकार धरती के वातावरण को गर्म बनाए रखता है। गौरतलब है कि मनुष्यों, प्राणियों और पौधों के जीवित रहने के लिए कम से कम 16 डिग्री सेल्शियस तापमान आवश्यक होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रीनहाउस गैसों में बढ़ोतरी होने पर यह आवरण और भी सघन या मोटा होता जाता है। ऐसे में यह आवरण सूर्य की अधिक किरणों को रोकने लगता है और फिर यहीं से शुरू हो जाते हैं ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव।