प्रायद्वीपीय ब्रह्माण्ड : आकाशगंगा

सर्पिल आकाशगंगा की संरचना डिस्क के आकार की होती हैं। सर्पिल आकाशगंगाओं का केंद्रीय भाग थोड़ा सा उठा हुआ प्रतीत होता है। केंद्रीय भाग के बाहर उसके दो विचित्र संरचना वाले हाथ निकले प्रतीत होते हैं। इस प्रकार की आकाशगंगा में मुख्यतः ‘ए’ और ‘बी’ प्रकार के गर्म एवं प्रकाशमान तारे होते हैं। जैसा कि हम जानते हैं कि ‘ए’ और ‘बी’ प्रकार के तारों का जीवनकाल बहुत ही कम होता है। इसलिए हम यह कह सकते हैं कि सर्पिल आकाशगंगा में कम आयु वाले तारे हैं। और यहाँ पर नये तारों का निर्माण भी होता रहता है। हमारी आकाशगंगा भी इसी प्रकार की संरचना वाली है। हमारी पड़ोसन मंदाकिनी देवयानी भी सर्पिल संरचना वाली है। क्या आप जानते हैं कि अभी तक संपूर्ण ज्ञातव्य ब्रह्मांड में उपस्थित सभी आकाशगंगाओं में 80 प्रतिशत आकाशगंगाएं सर्पिल संरचना वाली हैं।
दीर्घवृत्ताकार आकाशगंगाएं
इस प्रकार की आकाशगंगाएं चिकनी तथा बिना किसी विचित्रता के होती हैं। ब्रह्मांड में अब तक ज्ञात कुल आकाशगंगाओं में लगभग 17 प्रतिशत आकाशगंगाएं इसी प्रकार की संरचना वाली हैं।
जब हम रात में तारोँ से भरे आकाश को देखते हैं तो हम उसकी दीप्ति के वैभव से प्रफुल्लित हो उठते हैं। यदि हम किसी गाँव में रहकर आकाश दर्शन करते हैं तो और भी अधिक आनंद आता हैं, क्योंकि शहरोँ की अपेक्षा गाँवों में बिजली की रोशनी की चकाचौंध कम होतीं हैं तथा वातावरण स्वच्छ एवं शांत होता हैं।
जब हम प्रतिदिन आकाश का अवलोकन करतें हैं तो हमें धीरे-धीरे यह पता चलने लगता है कि न ही सभी तारों का प्रकाश एकसमान है, और न ही उनकें रंग। हम अपनी नंगी आंखों से जितने भी तारों एवं तारा समूहों (Constellations) को देख सकते हैं, वे सभी एक अत्यंत विराट योजना के सदस्य हैं, जो आकाश में लगभग उत्तर से दक्षिण तक फैला हुआ नदी के समान प्रवाहमान प्रतीत होता है। इसे 'आकाशगंगा' या 'मंदाकिनी (Galaxy) कहते हैं।
यदि हम आकाशगंगा को वैज्ञानिक भाषा में परिभाषित करें तो हम यह कह सकते हैं कि यह तारों का ऐसा समूह है जो अपने ही गुरुत्वाकर्षण बल (Gravity) के कारण एक-दूसरे से परस्पर बंधे हुए होते हैं। प्राचीन काल के ज्योतिषियों ने केवल आकाश में दिखाई देने वालें शुभ्र पट्टे को ही आकाशगंगा माना। परन्तु आज हम यह जानते हैं कि इसमें अरबों तारों (जिसमें से अधिकांश तारे नंगी आंखों से दिखाई नही देते हैं) के अतिरिक्त, हमारी पृथ्वी, चन्द्रमा, अन्य सभी ग्रह, सभी ग्रहों के भी चन्द्रमा (नैसर्गिक उपग्रह), उल्कापिंड (Meteoroid) तथा सौरमंडल के अन्य सभी सदस्य सम्मिलित हैं। आकाशगंगा की इसी विशालता के कारण ही इसे 'प्रायद्वीपीय ब्रह्माण्ड' भी कहते हैं।
हमारे ब्रह्माण्ड में करोड़ों-अरबों की संख्या में आकाशगंगाएं हैं। प्रत्येक आकाशगंगा में तारों के अतिरिक्त गैसों तथा धूलों का विशाल बादल भी होते हैं। इन विशाल बादलों को ताराभौतिकी में 'नीहारिका' (Nebula) कहा जाता हैं। आकाशगंगा के कुल द्रव्य का 98% भाग तारों तथा शेष 2% भाग गैस एवं धूल के विशाल बादलों (Gas and Dust Cloud) से निर्मित हैं।
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