मानव शरीर असंख्य छोटी-छोटी इकाईयों से मिलकर से बना है। इन इकाईयों को कोशिकाएं (Cells) कहा जाता है। कोशिका शरीर का एक बहुत ही सूक्ष्म रूप है। यह शरीर की एक मूलभूत रचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है जो स्वतन्त्र रूप से जीवन की क्रियाओं को चलाने की क्षमता रखती है।
शरीर के अलग-अलग अंगों की कोशिकाएं अलग-अलग होती है, लेकिन कोशिकाओं की मूलभूत संरचना एक समान ही होती है। ये इतनी छोटी होती है, कि इन्हें बिना सूक्ष्मदर्शी (माइक्रोस्कोप) के देख पाना सम्भव ही नहीं है। इन्हें स्टेन करने के बाद स्लाइड पर स्थित करके ही देखा जा सकता है। स्टेन करने से कोशिका के अलग-अलग भाग अलग-अलग रंग ग्रहण करके एक-दूसरे से अलग दिखाई देने लगते हैं। कोशिका की रचना के अंदर कई-एक सम्मिलित अंग आते हैं जिनके सामूहिक रूप को कोशिका (Cells) कहते हैं। कार्यों की विभिन्नता के कारण कोशिकाओं के आकार एवं आकृति में अन्तर होता है, लेकिन कुछ रचनात्मक विशिष्ट गुण उन सभी में समान रहते हैं।
1674 एंटोनी वॉन ल्यूवेन्हॉक ने जीवित कोशा का सर्वप्रथम अध्ययन किया।
उन्होंने जीवित कोशिका को दाँत की खुरचनी में देखा था ।
1831 में रॉबर्ट ब्राउन ने कोशिका में 'ककेंद्रक एवं केंद्रिका' का पता लगाया।
तदरोचित नामक वैज्ञानिक ने 1824 में कोशावाद (cell theory) का विचार प्रस्तुत किया, परन्तु इसका श्रेय वनस्पति-विज्ञान-शास्त्री श्लाइडेन (Matthias Jakob Schleiden) और जन्तु-विज्ञान-शास्त्री श्वान (Theodor Schwann) को दिया जाता है जिन्होंने ठीक प्रकार से कोशावाद को (1839 में) प्रस्तुत किया और बतलाया कि 'कोशाएँ पौधों तथा जन्तुओं की रचनात्मक इकाई हैं।'
1855 : रुडॉल्फ विर्चो ने विचार रखा कि कोशिकाएँ सदा कोशिकाओं के विभाजन से ही पैदा होती हैं।
1953: वाट्सन और क्रिक (Watson and Crick) ने डीएनए के 'डबल-हेलिक्स संरचना' की पहली बार घोषणा की1