1905 की बंगाल विभाजन की अलोकप्रिय घटना के बाद बंगाल में नए सिरे से ऐसी राजनीतिक जागृति आयी जो इससे पहले कभी नहीं देखी गई थी। यह माना जा सकता है कि बंगाल आतंकवादी क्रांतिकारी आंदोलन का केंद्र बिंदु था। बंगाल में क्रांतिकारी आंदोलन का सूत्रपात 'भद्रलोक समाज ' ने किया। श्री पी. मिश्रा तथा वरिंद्र कुमार घोष एवं भूपेंद्र दत्त आदि के सहयोग से 1902 में मिदनापुर ' अनुशीलन समिति ' का गठन किया गया, जिसका प्रमुख उद्देश्य था " खून के बदले खून। " 1902 ई. में ही पुलीन दास में ढाका अनुशीलन समिति की स्थापना की। 1905 ई. में पी. मिश्रा ने' कलकत्ता अनुशीलन समिति ' की स्थापना की। अंग्रेज विरोधी विचारों के प्रकाशन के लिए तथा क्रांतिकारी कार्यों को संगठित करने के लिए 1902 में वारिंद्र कुमार घोष ने ' भवानी मंदिर ' नामक पुस्तिका का प्रकाशन किया। इसके बाद ' वर्तमान रणनीति ' नामक पुस्तिका तथा ' युगांतर ' और ' संध्या ' नामक पत्रिकाओं में भी अंग्रेज विरोधी विचार प्रकाशित किए जाने लगे। बंगाल के युवकों को शक्ति का प्रतीक भवानी की पूजा करने को कहा गया ताकि वे मानसिक, शारीरिक, आत्मिक तथा नैतिक बल प्राप्त कर सकें। कर्म करने पर भी जोर दिया गया।