असहयोग आंदोलन (1920-22)

असहयोग आंदोलन औपचारिक रूप से 1 अगस्त, 1920 को शुरू हुआ था। इसी दिन अर्थात् 1 अगस्त, 1920 को बाल गंगाधर तिलक का निधन हो गया। परन्तु गांधीजी, मोतीलाल नेहरू और चितरंजन दास ने जल्दी ही इस कमी को पूरा कर लिया। कांग्रेस ने गांधीजी की इस योजना को स्वीकार कर लिया कि जब तक पंजाब तथा खिलाफत संबंधी अत्याचारों की भरपाई नहीं होती और स्वराज स्थापित नहीं होता, सरकार से असहयोग किया जाएगा। लोगों से आग्रह किया गया कि वे सरकारी शिक्षा संस्थाओं , अदालतों और विधान मंडलों का बहिष्कार करें। विदेशी वस्त्रों का त्याग करें, सरकार से प्राप्त उपाधियों और सम्मान वापस करें तथा हाथ से सूत कातकर और बुनकर खादी का इस्तेमाल करें। बाद में सरकारी नौकरी से स्तीफा तथा कर चुकाने से इंकार करने को भी इस कार्यक्रम में शामिल कर लिया गया। 

दिसंबर 1920 में नागपुर में आयोजित कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में सरकार तथा उसके कानूनों के अत्यंत शांतिपूर्ण उलंघन के निर्णय को अनुमोदित कर दिया गया। गांधीजी ने नागपुर में घोषणा की कि ' ब्रिटिश सरकार यह बात समझ लें कि वह न्याय नहीं करना चाहती तो साम्राज्य को भ्रष्ट करना प्रत्येक भारतीय का परम कर्तव्य होगा। इसी अधिवेशन में असहयोग प्रस्ताव से संबंधित विरोध लाला लाजपत राय एवं चितरंजन दास ने वापस ले लिया।इसी समय कांग्रेस कमेटियों का पुनर्गठन भाषीय आधार पर किया गया। कांग्रेस अब विदेशी शासन से मुक्ति के राष्ट्रीय संघर्ष में जनता की संगठनकर्ता और नेतृत्वकर्ता बन गई। हिन्दू और मुसलमान कंधे से कंधा मिला कर आगे बढ़ रहे थे। साथ ही कुछ पुराने नेताओं ने अब कांग्रेस छोड़ भी दिया था।

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