रजत मान या चांदी मान उस महोदय व्यवस्था को कहते हैं। जिसमें चांदी के सिक्के चरण में होते हैं अथवा चांदी को की मौद्रिक व्यवस्था का आधार बनाया जाता है एक धातु मन संसार में स्वर्ण मान्या रजत मान के रूप में विद्यमान रहा मुद्रा मान के रूप में चांदी का महत्व स्वर्ण की तुलना में कम चांदी को मुद्रा मान के रूप में स्वर्ण मान की तुलना में कम देशों ने कम समय के लिए अपनाया। इसका मुख्य कारण चांदी का सोने की तुलना में अधिक भार वाहन एवं कम मूल्यवान होना है। इसकी पूर्ति भी अधिक प्रभाव चल रही 1873 में पूर्व ब्रिटेन को छोड़कर सभी देशों ने रजत मान अपना लिया था भारत में 1853 में रजत मान अपनाया गया। भारत में चलाएं मान चांदी के रूप में एक रुपए के सिक्के का वजन 180 ग्रेन था जिसमें 165 ग्रेन शुद्ध चांदी होती थी। 1970 से चांदी मान का अपनाया जाना कम होने लगा 1873 से 79 के बीच चांदी के मूल्यों में आवाज आनी शुरू हुई जर्मनी फ्रांस बेल्जियम आदि ने रजत मान का त्याग करना प्रारंभ कर दिया जिससे चांदी की पूर्ति और भी बढ़ने लगी तथा उसके मूल्यों में गिरावट आनी शुरू हुई भारत में 1893 में रजत मान का त्याग कर दिया तथा 1940 के बाद चांदी के सिक्कों का चलना भी बंद हो गया
आज की प्रगतिशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए उपयुक्त भी नहीं है चांदी की पूर्ति आवश्यकता से बहुत कम है चांदी के सिक्कों की ढलाई खर्चीला कार्य है। मूल्य संचय के रूप में चांदी के सिक्कों को रखने पर अधिक स्थान की आवश्यकता पड़ती है इस प्रकार आज की अर्थव्यवस्थाओं के लिए या मान बिल्कुल अव्यवहारिक है
चांदी को बिना किसी प्रतिबंध के चांदी के सिक्कों में डाला जा सकता है। जनता चांदी देकर उसके बदले सरकार से चांदी की मुद्रा प्राप्त कर सकती है। चांदी का सिक्का होने के कारण लोगों को इसमें विश्वास बना रहता है। चांदी की पूर्ति अन्य की तुलना में अधिक आसान है आवश्यकता पड़ने पर इसकी मुद्रा की पूर्ति घटाए बढ़ाई जा सकती है। चांदी की पूर्ति धातुओं की तुलना में अधिक निश्चित है इस के मूल्यों में परिवर्तन होते रहते हैं इसी कारण हम चांदी की मुद्रा को अपनी आवश्यकता अनुसार बड़ा नहीं सकते हैं। सोने की तुलना में अधिक होने के कारण इस की मुद्रा का निर्गमन अधिक हो सकता है जिससे मुद्रा प्रसार की स्थिति आ सकती है।