भारत में मुद्रास्फीति

मुद्रास्फीति सभी प्रकार की अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है। जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि यदि स्थिति अपने बाल्यकाल में है। और अर्थात थोड़ी बहुत सी स्थिति होती है तो उत्पादन बढ़ता है लोगों की आय बढ़ती है और अर्थव्यवस्था में विकास की दर तीव्र होती है परंतु यदि स्थिति की ब्रदर पर होने लगती है तो इसका देश की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार अर्थव्यवस्था विकसित या विकासशील या विकसित हो सभी के लिए थोड़ी बहुत स्थिति का स्वागत है विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के कैसे नाजुक मोड पर खड़ी होती है जहां इधर गिरा कोई उधर गिरा तो खाए की स्थिति होती है।

विकासशील देशों में आर्थिक साधनों की कमी होती है कल्याण की योजनाएं एवं सुविधाएं कम होती है लोगों को अधिक से अधिक सुविधाएं प्रदान करने एवं विकास को बढ़ाने के लिए सरकार को बहुत सारी योजनाएं चलानी पड़ती है जिसमें ढेर सारा पैसा खर्च होता है। उदाहरण के लिए लोगों को अधिक चिकित्सा सुविधा पहुंचाने के लिए अधिक अस्पताल खुलवाने पड़ते हैं। जिनमें बहुत सा रुपया खर्च होता है याद आया सुविधाएं पहुंचाने के लिए अधिक से बनी होती हैं अधिक बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के लिए अधिक स्कूल कॉलेज खुलवाने पढ़ते हैं। इस प्रकार सरकार को निरंतर बड़ी मात्रा में खर्च करते रहना पड़ता है दूसरी ओर सरकार की आय सीमित होती है कमाई वाले लोगों को भी सीमित मात्रा में लिया जा सकता है लोगों की बचत कम होने से कम ही मात्रा में मिल सकता है निर्यात की मात्रा में ही मिल सकता है इन सब का मिलाजुला परिणाम होता है कि सरकार और सरकार दोनों ही देते हैं विभिन्न प्रकार के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों में वृद्धि की जाती है। अप्रत्यक्ष कर देती है द्वारा पूरा किया जाता है इस प्रकार विकासशील अर्थव्यवस्था एवं विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में काका नहीं होता बल्कि इसका एक कारण होता है। इसके अलावा भी बहुत करते हैं अपने विकास के लिए विदेशों से मांगना पड़ता है कब और किन देशों में वस्तुओं सेवाओं की कमी होती है। दूसरी, और यथासंभव अधिक से अधिक निर्यात परिणाम होता है की वस्तुओं सेवाओं की और और आती है जिससे उत्पन्न होती है। कभी-कभी हो जाती है वाला सामान बहुत महंगा बिकता है और विदेशी मूल पर बेचते हैं।

विकासशील देशों में भ्रष्टाचार आम बात है व्यापारी के द्वारा आवश्यक रूप से वस्तुओं की कीमतें बढ़ा देते हैं मजदूरों को मिलने वाली मजदूरी जीवन निर्वाह के लिए करती है। दूसरी ओर, उद्योगपति मजदूरी बढ़ाना नहीं चाहता है या बड़ा नहीं पाता जिससे आए दिन हड़ताल आज देखने को मिलता है। इन सबसे उत्पादन में कमी आती है और  कीमतें बढ़ती हैं।

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