इस्लामिक बैंकिंग की अवधारणा

विश्व में बैंकिंग प्रणाली अपने कई स्वरूपों को बदलते हुए आजकल परिष्कृत रूप में दिखाई देती है। सभ्यता के विकास के साथ-साथ मनुष्य की कार्यप्रणाली आवश्यकता एवं विचारों में अंतर आता गया और यही आधार उसके बदलाव का कारण भी बना कागजी मुद्रा का चलन से मनुष्य को अपनी जरूरतों को पूरा करना बहुत आसान हो गया क्योंकि मुद्रा हर जरूरत को पूरा करने में सक्षम थी। वास्तव में कागजी मुद्रा ने भुगतान को आसान बनाया वही इसमें वनीता विश्वसनीयता जैसे गुण भी थे। अब साहूकार लोगों से कम ब्याज पर पैसा लेकर जरूरतमंदों को ज्यादा ब्याज पर उधार देने लगे

क्योंकि धन के लेन देन का कार्य एक बेंच पर बैठकर किया जाता था। और बेंच ग्रीक शब्द है जिसे बैंक भी कहा जाता है।  इस तरह से आगे चलकर बैंक शब्द एवम् बैंकिंग का चलन हुआ। लोगों को साहूकारों के चंगुल से छुड़ाने के लिए बैंक चलन में आए आरंंभ में या बैंक निजी क्षेत्र के थे तथा इनका उद्देश्य धन कमाना या बड़े औद्योगिक घरानों को ही कर्ज मिल पाता था बैंक की सुविधाएं आमजन एवं गरीब लोगों के लिए बहुत दूर थी। यह सामाजिक असमानता को दूर करने एवं ग्रामीण तथा गरीब लोगों को बैंकों से जोड़ने के उद्देश्य से 19 जुलाई 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। जिसके बाद सामाजिक बैंकिंग वित्तीय समावेशन के साथ-साथ जन धन योजना, मुद्रा योजना, स्टार्टअप योजना आरंभ हुई।

 इस्लामी बैंकिंग का प्रादुर्भाव

इस्लामिक सिद्धांतों के अनुसार ब्याज वसूलना एक पाप है इसलिए कतिपय इस्लामिक देशों में ब्याज लिए जाने पर प्रतिबंध है इस्लाम में मुद्रा को विनिमय का माध्यम और वस्तु या सेवा के मूल्य का निर्धारक तत्व माना जाता है। इसलिए इस्लाम में मुद्रा को आए प्राप्ति का साधन नहीं माना जाता था अर्थात मुद्रा या धन को ब्याज पर उठाने ब्याज लेने एवं देने पर प्रतिबंध है ब्याज का भुगतान समाज के अन्याय एवं शोषण को जन्म देता है पवित्र कुरान में ब्याज को अनुचित एवं जुल्म करार दिया गया है। आज के इस वाणिज्यिक युग में बैंक आर्थिक क्रियाओं की दूरी है। ऐसे में ब्याज रहित बैंकिंग प्रणाली की अवधारणा अपने आप में व्यावहारिक भले ही लगती हो लेकिन कई इस्लामिक देशों में या एक वास्तविकता है।

इस्लामी बैंकिंग बैंकिंग क्रियाओं से युक्त एक ऐसी प्रणाली है। जो शरीर के सिद्धांतों पर आधारित है इस्लामिक बैंकिंग के सिद्धांत एवं नैतिक मूल्यों को सराहा गया है आर्थिक मंदी की आशंका के बीच जब विकसित देशों के केंद्रीय बैंक ब्याज दर एवं अथवा ब्याज दर की अवधारणा को अपना रहे हैं वहां ब्याज लेने देने की अवधारणा  अपनाकर बैंकिंग सेवाएं प्रदान करनी है

आधुनिक इस्लामिक उद्भव के साथ ही माना जा सकता है जब मुहम्मद साबित अपनी पत्नी के कारोबार को परिचालित करने वाले एक अभिकर्ता थे शताब्दियों तक  शताब्दियों तक इस्लामिक साझेदारी व्यवसायिक जगत का आधार रहा है व्यवसायिक ब्याज के लिए कोई स्थान नहीं रहा है ऐसी सारी एक महत्वपूर्ण कार्य करती है तथा इस साझेदारी का प्रमुख अंग है व्यवसाय में श्रम तथा उद्यमिता एक ही व्यक्ति में निहित होती है स्वामी श्रमिक एवं उद्यमी के साथ मिलकर व्यवसाय चलाते हैं और निर्धारित शर्तों पर लाभ को आपस में बांट लेते हैं

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