पारिस्थितिकी सूक्ष्मजीवों पादप जीव जंतुओं एवं मानव सहित अनेक जीव धारियों एवं उनके आसपास के वातावरण के बीच पारस्परिक संबंधों का वैज्ञानिक अध्ययन है। इसके अंतर्गत उन तरीकों को खोजा एवं विश्लेषण किया जाता है जिनसे जीवधारी स्वयं को अपने चारों ओर के वातावरण के अनुरूप डालते हैं। यह जीवधारी किस प्रकार ऊर्जा प्रवाह एवं खनिज चक्रण सहित पर्यावरणीय संसाधनों का उपयोग स्वयं को जीवित रखने स्वयं का विकास करने के लिए करते हैं।
जहां तक परिस्थिति अर्थात इकोलॉजी शब्द के उद्भव का प्रश्न है तो इसका प्रारंभ 1868 से माना जाता है। वस्तुतः ग्रीक भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है। जिसका अर्थ है। घर अथवा रहने वाला स्थान जिसका अर्थ है अध्ययन इस प्रकार इकोलॉजी पति के घर का अध्ययन है।
पारिस्थितिकी का इतिहास
पारिस्थितिकी की जड़ें प्राकृतिक इतिहास में समाई हुई हैं जो उतना ही पुरातन है। जितना कि मानव सभ्यता प्रागैतिहासिक काल में मानव ने जानबूझकर अथवा और अनजाने में पारिस्थितिकी के साथ व्यवहारिक रूप से संघर्ष किया आदिम समाजों में जीवित रहने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने आसपास के वातावरण मुख्य रूप से प्राकृतिक वातावरण के बारे में पर्याप्त जानकारी होती थी पशु पक्षी पौधा पेड़ पौधे झाड़ियां मानव के जीवित रहने के लिए चुनौतियां भी थी और साधन भी
प्राचीन भारतीय ग्रंथों के दो सदनों ब्राह्मणों को उपनिषदों में प्रसिद्ध की अवधारणाओं का उल्लेख है। पवित्र कुरान में प्रसिद्ध किए संगठनों के पारस्परिक संबंधों का उल्लेख है चरक संहिता एवं सुश्रुत संहिता की विधियां एवं औषधियां प्रमाणित करती हैं कि प्राचीन कालीन मानव को पादप उपयोग खनिज और जीव जंतुओं के लक्षणों की व्यवस्थित जानकारी प्रागैतिहासिक लेखों में आदतों एवं पशुओं के रूप में पशुओं के वर्गीकरण मिट्टी की प्रकृति तथा उपयोगिता के अनुसार वर्गीकरण जलवायु एवं वनस्पतियों का वर्गीकरण विभिन्न स्थानों पर उगने वाले पौधों का उल्लेख मिलता है। चरक संहिता में कहा गया है कि वायु भूमि जल एवं जीवन के लिए आए थे। इनके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।
पर्यावरण
पर्यावरण के अंतर्गत उन समस्त तथ्यों को शामिल किया जाता है जो जंतु वह मानव एवं वनस्पतियों पादपों के जीवित रहने तथा उनकी समृद्धि और विकास के लिए आवश्यक है अर्थात अवयव को उसके जीवन काल में किसी भी प्रकार से प्रभावित कर सकने वाले कारक को पर्यावरण का अंग माना जाता है पर्यावरण के संघटकों में जैविक तथा अजैविक दोनों ही प्रकार के संगठक सम्मिलित हैं। विषाणु से लेकर मानव तक समस्त जीवधारी भोजन ऊर्जा जल ऑक्सीजन आश्रय तथा अन्य आवश्यक आवश्यकता ों के लिए पर्यावरण पर निर्भर है। इस प्रकार जीव धारियों को चारों ओर के जीवित एवं अजीवित संगठनों प्रभाव तथा घटनाओं को मिलाकर पर्यावरण कहा जाता है।