निशक्तजन और मानवाधिकार

आधारभूत रूप से मानव अधिकार उन सभी परिस्थितियों की उपलब्धि है जिसमें व्यक्ति अपनी अंतर्निहित शक्तियों को विकसित कर सकता है। जो प्रकृति ने उसे दी है इसमें जन्म प्रजाति धर्म लिंग रंग या किसी भी प्रकार की शारीरिक निशक्तता का कोई महत्व नहीं होता है। अन्य व्यक्तियों की तरह ही निशक्तों से भी मानवाधिकार होते हैं मानवाधिकार सबसे ही इसका अर्थ प्रतिबिंब होता है। या अधिकार मानव को मानव होने के कारण प्राप्त है। इन अधिकारों को प्राप्त करने तथा इनका उपयोग करने के लिए मनुष्य होने के अलावा ना तो किसी खास योग्यता की जरूरत है। और ना ही किसी शारीरिक कमी की वजह से मानवाधिकार से उसे वंचित किया जा सकता है। मानवाधिकार की अवधारणा प्राचीन काल से हो रही है। हर मानव प्राणी होने की अधिकारों का हकदार है संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा दी गई मानवाधिकार की घोषणा की पहली पंक्ति में ही लिखा गया है। कि मानव अधिकारों का प्रमुख्य कार्य संसार में स्वतंत्रता शक्ति एवं न्याय की स्थापना करना है। मानव परिवार के सभी सदस्यों की जन्मजात गरिमा और सम्मान की स्वीकृति ही विश्व में शांति न्याय और स्वतंत्रता की बुनियाद है।

विकलांग से दिव्यांग तक

अंग्रेजी में निशक्त या विकलांग शब्द की व्याख्या शुरुआत में हैंडीकैप्ड या डिसेबल के रूप में की जाती है। आगे चलकर 1980 के दशक में इस परिदृश्य में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास किया गया अमेरिका के डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी ने विकलांगों को के लिए हैंडीकैप्ड की जगह डिफरेंट अली एडल्ट शब्द के इस्तेमाल पर जोर दिया जो अपने पूर्ववर्ती शब्द हैंडीकैप्ड या डिसएबल की तुलना में ज्यादा स्वीकार हुआ। निशक्तजनों की भावनाओं को समझते हुए उन्हें एक सौम्य और करुणामई शब्द से नवाज कर इस समिति ने भी अपने अतिरिक्त योग्यता का प्रमाण प्रस्तुत किया।

मानवाधिकार एवं निशक्तता

मानवाधिकारों को लेकर प्राचीन यूनान में अरस्तू ने अपनी पुस्तक न्याय के सिद्धांत में इसकी चर्चा की थी। और रोम में शिष्यों ने जूस नेचुरल का सिद्धांत दिया था।भारत में भी महाभारत जैसे ग्रंथों में इस विषय पर उल्लेख किया गया है। मध्यकाल में कैथोलिक धर्म ने इन अधिकारों को अन्य अधिकारों से ऊपर माना उस काल में न्याय पूर्ण रूप से इन अधिकारों की रक्षा भी की जाती थी। इसी तरह आधुनिक काल में पुनर्जागरण के दौरान के बाद प्राकृतिक न्याय और प्राकृतिक अधिकारों की स्थापना हुई 10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने विश्व मानवाधिकार घोषणा पत्र जारी कर पहली बार मानवाधिकार व मानव की आधारभूत स्वतंत्रता को लेकर घोषणा की उसके बाद 1950 में संयुक्त राष्ट्र ने हर साल 10 दिसंबर की तिथि को विश्व मानवाधिकार दिवस किया। इससे पहले संबंधित विश्व मानवाधिकार घोषणा पत्र एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। जिसमें प्रतिष्ठा समृद्धि व शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के प्रति मानव शक्ति है।

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