प्राचीन भारतीय इतिहास-47 गुप्त साम्राज्य

गुप्त साम्राज्य

      गुप्त साम्राज्य की स्थापना चन्द्रगुप्त प्रथम ने 319-200 में की थी। इसी वर्ष चन्द्रगुप्त प्रथम ने एक नये संवत् गुप्त संवत् की शुरूआत की। यह प्रथम गुप्त शासक था, जिसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। इसने लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया। इस उपलक्ष्य में राजा रानी या विवाह प्रकार के स्वर्ण सिक्के चलाया। 

      चन्द्रगुप्त प्रथम के पश्चात् गुप्त वंश का सबसे प्रतापी राजा उसका पुत्र समुद्रगुप्त हुआ।

      इतिहासकार वी0एस0 स्मिथ, समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा

      समुद्रगुप्त का दरबारी कवि हरिषेण था जिसने प्रयाग प्रशस्ति की रचना की थी। जिसमें समुद्रगुप्त उपलब्धियों का वर्णन है। यह चम्पूशैली (गद्य-पद्य) लिखी गयी है।

      समुद्रगुप्त  ने अपने विजयो के उपलक्ष्य में अश्वमेध यज्ञ किया था।

      समुद्रगुप्त संगीत प्रेमी था उसे उसके सिक्कों पर वीणा बजाते हुये दिखाया गया है।

      समुद्रगुप्त विद्या का बड़ा प्रेमी था उसकी एक उपाधि कवि प्रिय भी थी।

      समुद्रगुप्त का उत्तराधिकारी चन्द्रगुप्त द्वितीय 3800 मंे राजगद्दी पर बैठा।

      चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में बौद्ध चीनी यात्री फाहयान भारत आया था।

      फाहयान ने अपने यात्रा वृतान्त में कही भी अपने समकालीन गुप्त शासक का उल्लेख नही किया है। इसका यात्रा वृतांत फो-क्यो-की नाम से जाना जाता है।

      चन्द्रगुप्त द्वितीय ने गुजरात के शकांे पर विजय के उपलक्ष्य में विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी।

-शेष अगले भाग में

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