प्राचीन भारतीय इतिहास-48 गुप्त साम्राज्य

गुप्त साम्राज्य

      शकांे पर विजय के उपरान्त चन्द्रगुप्त द्वितीय ने चाँदी के सिक्के चलवाये थे।

      नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के पुत्र कुमार गुप्त ने की थी।

      स्कन्दगुप्त ने सुदर्शन झील का पुनरूद्वार करवाया था। स्कन्दगुप्त के शासनकाल में हूणांे का आक्रमण शुरू हुआ। अन्तिम गुप्त शासक भानु था। कुमारगुप्त तृतीय था।

      गुप्त सम्राज्य की सबसे बड़ी प्रादेशिक इकाई देश थी जिसके शासक को गोप्ता कहा जाता था एक दूसरी प्रादेशिक इकाई भुक्ति थी जिसके शासक उपरिक कहलाते थे। जिले को विषय कहा जाता था जिसका शासक विषयपति होता था। ध्रुवाधिकरण-भूमिकर वसूलने वाला अधिकारी था।

      प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम था। ग्राम सभा का मुखिया ग्रामणी कहलाता था।

      गुप्त राजाओं ने सर्वाधिक स्वर्ण मुद्राये जारी की। इन्हंें अभिलेखों में दीनार कहा गया हैै। चाँदी के सिक्के को रूपक या रूप्य कहा जाता था।

      दास मुक्ति के अनुष्ठान का विधान सर्वप्रथम नारद ने दिया है। नारद स्मृति में दासोे की सबसे लम्बी सूची मिलती है।

      त्रयधसीरिन या सीरिन-गुप्त काल में बटाई पर ख्ेाती करने वाले किसान थे।

      कायस्थों का सर्वप्रथम वर्णन याज्ञबलक्य स्मृति मंे मिलता है एवं जाति के रूप में कायस्थों का पहला वर्णन ओशनम् स्मृति में मिलता है।

      सती प्रथा का पहला अभिलेखीय प्रमाण 5100 के भानुगुप्त के एरण अभिलेख में मिलता है।

      गुप्त सम्राट वैष्णव धर्म के अनुयायी थे। अजन्ता की गुफाओं में गुफा संख्या 16, 17 19 ही केवल गुप्तकालीन है। ये मुख्यतः ब्राह्मण एवं बौद्धधर्म से सम्बन्धित हैं।

      गुफा संख्या 16 में उत्कीर्ण मरणासन्न राजकुमारी का चित्र है।

      अजन्ता की गुफायें बौद्व धर्म के महायान शाखा से सम्बिन्धत है। चन्द्रगुप्त द्वितीय के दरबार में विभिन्न विधाओं मेें पारंगत नौ विद्वान निवास करते थे। इन्ही नौ रत्नों में संस्कृत भाषा के सबसे प्रसिद्व कवि कालीदास थे।

      याज्ञवलक्य, नारद, कात्यायन एवं वृहस्पति स्मृतियों की रचना गुप्त काल में हुयी।

      सांस्कृतिक उपलब्धियों के कारण गुप्त काल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता है।

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