आर्थिक विकास- आर्थिक विकास की दृष्टि से इस प्रदेश के देश अर्द्धविकसित अवस्था में हैं। यहाँ के निवासियों का मुख्य व्यवसाय कृषि एवं पशुपालन है। अब घुमन्तु पशुपालन एवं शिकार इतिहास की बात बनते जा रहे हैं। जिन भागों में वर्षा अच्छी होती है अथवा बांध बनाकर या नहरें बनाकर सिंचित कृषि का विकास किया गया है, जैसे- सूडान, जाम्बिया, पूर्वी अफ्रीका, ब्राजील, ओरनिको नदी की घाटी, आदि में कपास, गेहूँ, कहवा, ज्वार, बाजरा, चावल, गन्ना, मूंगफली और मक्का की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।
इस प्रदेश में खनिज पदार्थों का अभाव पाया जाता है। जायरे एवं पूर्वी अफ्रीका में कुछ खनिज पाए जाते हैं- सोना, कोयला, तांबा, क्रोमियम तथा लौह-अयस्क, वेनेजुएला में खनिज तेल निकाला जाता है। नाइजीरिया में टिन, कोयला व खनिज तेल निकाला जाता है। यहाँ परिवहन के साधनों का सीमित विकास के कारण औद्योगीकरण कम हुआ है। अब कहीं-कहीं औद्योगिक क्षेत्र विकसित होने लगे हैं।
उष्ण मरुस्थल अथवा सहारा तुल्य जलवायु प्रदेश:-
स्थिति और विस्तार- उष्ण मरुस्थल प्रदेश उत्तरी तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में 15° से 30° अक्षांशों के बीच महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में स्थित हैं। इस जलवायु प्रदेश का सबसे बड़ा भाग सहारा मरुस्थल है जो लाल सागर से अन्ध महासागर तक फैला हुआ है। इसी कारण इस जलवायु को सहारा तुल्य जलवायु प्रदेश भी कहा जाता है। इसके अलावा ईरान, बलूचिस्तान, सऊदी थार के मरुस्थल (एशिया) में भी यह जलवायु पायी जाती है। इन मरुस्थलीय प्रदेशों ने भूमण्डल का 17% भाग घेर रखा है, किन्तु विश्व की केवल 4 प्रतिशत जनसंख्या ही यहाँ निवास करती है।
इन प्रदेशों का विस्तार अन्य महाद्वीपों में निम्न प्रकार है-
- एशिया में दक्षिणी-पश्चिमी भाग में सम्पूर्ण अरब प्रायद्वीप, दक्षिण इजराइल, जोर्डन, सीरिया, इराक, ईरान के अधिकांश भाग और भारत में थार मरुस्थल हैं।
- दक्षिण अमरीका में अटाकामा मरुस्थल (4° दक्षिण से 31° दक्षिण) के अन्तर्गत पेरू के तटवर्ती तथा उत्तरी चिली के भाग आते हैं।
- ऑस्ट्रेलिया में पश्चिमी मरुस्थल (विक्टोरिया) इसी प्रदेश के अन्तर्गत आता है।
- उत्तरी अमरीका में सोनोरान और एरीजोना के मरुस्थल।
- दक्षिण अफ्रीका में कालाहारी मरुस्थल।
जलवायु- इस प्रदेश की जलवायु की मुख्य विशेषता उसकी उष्णता और शुष्कता है।
तापमान- विश्व में सबसे अधिक तापमान इसी प्रदेश में पाए जाते हैं। सहारा में अल-अजीजिया का तापमान 58.4° सेण्टीग्रेड, कैलीफोर्निया में मृत घाटी का तापमान 57° सेण्टीग्रेड, थार में जैकोबाबाद का 52° सेण्टीग्रेड, उत्तरी अमरीका के सोनोरान मरुस्थल में 56° सेण्टीग्रेड तापमान पाया जाता है। उत्तरी गोलार्द्ध में इन प्रदेशों का औसत तापमान जुलाई में 32° सेण्टीग्रेड और जनवरी में 15° सेण्टीग्रेड रहता है। दक्षिणी गोलार्द्ध में इन प्रदेशों में औसत तापमान कम रहता है, क्योंकि महाद्वीपों की चौड़ाई कम है, अतः समुद्री प्रभाव अधिक पड़ता है। दक्षिणी गोलार्द्ध में तापमान 21° सेण्टीग्रेड और जनवरी मास का 10° सेण्टीग्रेड रहता है। इस प्रदेश में दैनिक और वार्षिक ताप परिसर भी बहुत अधिक रहता है। यहाँ दैनिक ताप परिसर 7° सेण्टीग्रेड रहता है, किन्तु सहारा में कहीं-कहीं या अन्तर 30° सेण्टीग्रेड तक रहता है।
तापमान में तेज परिवर्तन होने से सायंकाल के समय तेज ऑधियाँ चलती हैं जिन्हें ‘धूल-दानव’ कहा जाता है। झुलसा देने वाली गर्म पवनों को सिमूम, शहाली, खमसिन और भारत में ‘लू’ कहा जाता है।
वर्षा- इन प्रदेशों में वर्षा का प्राय: अभाव पाया जाता है। कहीं भी साल भर में 25 सेण्टीमीटर से अधिक वर्षा नहीं होती है। वर्षा का वार्धिक औसत 12 सेंटीमीटर है। सहारा के सभी भागों में 12 सेण्टीमीटर से भी कम वर्षा होती है। कई भाग ऐसे भी हैं, जहाँ सालभर विल्कुल वर्षा नहीं होती है। दक्षिण अमरीका के इक्वावे नगर में वर्षभर में केवल 1.25 सेण्टीमीटर वर्षा होती है। काहिरा में 2 सेण्टीमीटर, जैकोबाबाद में 7 सेण्टीमीटर और अदन में 5 सेण्टीमीटर वर्षा होती है। इन प्रदेशों में संवाहनिक वर्षा होती है जो आकस्मिक और तेज बौछारों के रूप में आती है। तेज धूप के कारण शीघ्र ही जल का वाष्पीकरण हो जाता है। कई बार वर्ष या दो वर्ष की वर्षा एक ही दिन में (कुछ घण्टों में) ही हो जाती है। इन प्रदेशों में वर्षा कम होने के निम्नलिखित चार कारण हैं-
ये प्रदेश वर्ष भर सन्मार्गी पवनों के प्रभाव में रहते हैं जो उत्तर-पूर्व और दक्षिण-पूर्व दिशा से चलने के कारण महाद्वीपों के पूर्वी भागों में तो वर्षा कर देती हैं, किन्तु पश्चिमी भाग शुष्क रह जाते हैं।
पवनों की पट्टियों के खिसकने के फलस्वरूप विषुवत रेखीय न्यून भार केवल 15° उत्तरी अथवा दक्षिणी अक्षांश तक ही पहुँच जाता है। दूसरी ओर पछुआ हवाओं की पेटी भी शीतकाल में 30° अक्षांश से नीचे अथवा ऊपर नहीं जा पाती है। अत: ये प्रदेश शुष्क रह जाते हैं।
इन प्रदेशों में पश्चिमी तट पर ठण्डी जलधाराएँ चलती हैं, जो इन क्षेत्रों में आर्द्रता की कमी करती हैं।
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