सन 1600 - 1757 ईस्वी तक ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में एक व्यापारिक कंपनी के रूप में कार्य कर रही थी । कंपनी भारत में बहुमूल्य धातुएँ लाकर इसके बदले में यहां से कपड़े, मसाले आदि खरीद कर इसे ऊँचे दामों में विदेशों में बेचती थी।
शीघ्र ही भारतीय वस्त्रों की लोकप्रियता ब्रिटेन में बढ़ने लगी । इससे चिंतित होकर ब्रिटिश उद्योगपतियों ने भारतीय वस्त्रों के आयात पर रोक लगाने हेतु ब्रिटिश सरकार पर दबाव डालना शुरू किया।
1720 ई. तक ब्रिटिश सरकार मैं भारत से निर्यात होने वाले छापेदार एवं सूती वस्त्रों के आयात को प्रतिबंधित करने के उद्देश्य से कानून निर्मित किए। इसके साथ ही अन्य वस्त्रों के आयात पर भी भारी शुल्क आरोपित कर दिया गया।
1757 ई. के प्लासी युद्ध के वाद ब्रिटिश व्यापारिक कंपनी का भारत के साथ व्यापारिक संबंधों में गुणात्मक परिवर्तन देखने को मिला। अब कंपनी बंगाल एवं अन्य राज्यों से वसूल किए गए भू- राजस्व की राशि से भारतीय माल को खरीदकर विदेशों में अधिक कीमत पर बेचने लगी। इससे कंपनी ने भारी मुनाफा कमाया।
1757 ई. के बाद कंपनी द्वारा भारत से निर्यात किए जाने वाले माल के बदले कुछ भी लौटाया नहीं गया। इस तरह भारतीय धन का प्रतिवर्ष दोहन होता रहा तथा भारत को इसके बदले में कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ। इससे भारत प्रतिदिन गरीब एवं ब्रिटेन मैं समृद्धि आती चली गई।
भारत से होने वाली लूट के कारण ब्रिटेन में पूंजी का संचय होता गया जिसके कारण इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति संपन्न हुई ।
ब्रिटेन में घटित होने वाली उद्योगिक क्रांति ने ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था तथा भारत के साथ इसके संबंधों को पूरी तरह बदल कर रख दिया । खेतिहर भारत को अब औद्योगिक देश इंग्लैंड का आर्थिक उपनिवेश बनना पड़ा।
भारत स्थित ब्रिटिश सरकार ने अब मुक्त व्यापार की नीति अपनाई। इसके कारण भारतीय दस्तकारों को ब्रिटेन मैं मशीन निर्मित उत्पादों के साथ असमान प्रतियोगिता का सामना करना पड़ रहा था।
साथ ही भारत में ब्रिटिश निर्मित माल के लिए आयात शुल्क को न्यूनतम कर दिया , गया नए-नए इलाकों को जीतकर तथा अवध जैसे वृहद् एवं संपन्न राज्य को जीतकर ब्रिटिश सामानों के खरीदारों की संख्या बढ़ाने तथा भारत में पश्चिमीकरण का भी समर्थन किया गया ताकि भारतीयों में ब्रिटिश सामानों के प्रति रुचि पैदा की जा सके।
दूसरी तरफ भारतीय माल के आयात पर ब्रिटेन में उच्च आयात शुल्क लगाया गया जिससे इसके आयात को हतोत्साहित किया जा सके।
इस समगृ नीतियों का प्रत्यक्ष परिणाम हस्तशिल्प उद्योग के पतन के रूप में सामने आया। दस्तकार बेरोजगार हुए एवं जीविकोपार्जन हेतु कृषि की तरफ मुड़े जहाँ परिस्थितियाँ पहले से ही बद्तर थीं।
इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति को ध्यान में रखकर भारत पर इस बात के लिए दबाव डाला जाने लगा कि वह निर्मित माल की जगह कच्चे माल का निर्यात करें अर्थात् चाय नील एवं अनाज का निर्यात करें।
इस तरह 19वीं सदी के अंत तक भारत का निर्यात मुख्य रूप से कच्चे कपास , जूट, रेशम , तिलहन, गेहूं चमड़े, नील तथा चाय तक ही सीमित हो गया।