किसी भी स्थान के मौसम एवम जलवायु के अध्ययन में चक्रवातों का व्यापक महत्व है क्योंकि यह किसी भी स्थान के तापमान वायुदाब एवं वषाव को प्रभावित करती है यह एक प्रकार के द्वितीय परिसचरण होते हैं तथा स्थान विशेष के मौसमी दशाओं में व्यापक रूप से प्रभावित करते हैं चक्रवात के केंद्र में सबसे निम्न दाब तथा केंद्र के परिधि की ओर बढ़ने पर वायुदाब में वृद्धि होती है इसमें समदाब रेखाएं वृत्ताकार अंडाकार एवं त्रिभुजाकार की होती हैं क्योंकि केंद्र में निम्न दाब होता है इसलिए चक्रवात में पवनों का संचरण परिधि के उच्च दाब से केंद्र के निम्न दाब की ओर होती है फेरल का नियम के अनुसार चक्रवात नेताओं ने उत्तरी गोलार्ध में वामावर्त प्रवाहित होती है और दक्षिणी गोलार्ध में क्लॉक वाइज प्रवाहित होती है भौगोलिक वितरण में मौसमी विशेषताओं के आधार पर चक्रवात को दो भागों बाटा गया है ।
१-उष्णकटिबंधीय चक्रवात
२-शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात
उष्णकटिबंधीय चक्रवात-
उष्णकटिबंधीय चक्रवात के निर्माण के लिए आवश्यक दशाएं
१-उष्णकटिबंधीय चक्रवात दोनों ही गोलार्ध में 5 डिग्री से 23 डिग्री अक्षांशों के मध्य महासागरों के सतह पर निर्मित होते हैं
२- महासागरों के साथ है यह तभी निर्मित होते हैं जब सागरीय जल का तापमान 27 डिग्री सेल्सियस हो या उससे अधिक हो
३-ग्रीष्म ऋतु में सागरों की सतह पर यह ITCZ के सहारे विकसित होते हैं तथा विकसित होने के बाद महासागरों के सतह पर आ जाते हैं
४-महासागरों के सतह पर जहां चक्रवात निर्मित होते हैं थी उसके ऊपर छोभ मंडल प्रति चक्रवर्ती दशा होनी चाहिए ताकि सागर के सतह पर उठने वाली उष्ण अद्रं पवने में वाहित संचार होता है
५-व्यापारी पवन की गति 40km/h या उससे अधिक होना चाहिए ताकि सागर के सतह पर विस्थापित हो सके ।