भारत में डच कंपनी

डच शाक्ति का उदय :- सत्रहवीं शताब्दी में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार वाणिज्यवादी विचारधारा से प्रभावित होता जा रहा था । इस युग में व्यापारिक संगठन तथा साधन नए उद्देश्यों पर  आधारित होने लगे थे जो मध्यकालीन श्रमिक श्रेणियों से भिन्न थे । इस दृष्टि से डच  और इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी सोलहवीं शताब्दी की पुर्तगाली व्यापारिक संस्थाओ से भिन्न थी । इन्होंने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था को नया मोड़ प्रदान किया ।जहाँ भारत में पुर्तगाली साम्राज्य की संपूर्ण प्रशासनिक एवं व्यापारिक व्यवस्था शाही सरकार के  अधीन थी, वही डच व  इंग्लिश कम्पनियाँ पूर्णरूप से व्यापारिक संघ थी तथा  इनका संचालन कंपनी के सदस्यों द्वारा किया जाता था ।

सत्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ से हालैंड की राजधानी एम्स्टर्डम यूरोप का प्रमुख व्यापारिक केंद्र बनने लगा था ।सन्  1609 में 'एक्सचेंज बैंक' स्थापित हुआ तथा 1614 में 'क्रेडिट बैंक ऑफ एम्स्टर्डम' आरंभ हुआ।  एशिया से व्यापार करने के लिए  अनेक व्यापारिक कंपनियो ने भाग लेना आरंभ कियाा। साथ ही  एशिया का व्यापार पूूूंजी निवेश का आकर्षण बनता जा रहाा था।  एशियाई वस्तुओं की बिक्री भी  एम्स्टर्डम में की जाने लग थी जिससे यह "पुनः निर्यात व्यापार"  का एक मुुुुख्य केेेेन्द्र बन गया था यहा एशिया की अनेेेेक वस्तुओं की खुुुुली एवंं प्रतियोगी रूप मेेें बिक्री की जाती थी। 

इस पद्धति के बाद में इंग्लिश कंपनी ने भी अपनाया। यह पुर्तगाली व्यवस्था के पूर्ण विपरीत थी क्योंकि पुर्तगाली शासक  एशिया के मसालो का न केवल  25 प्रतिशत भाग  अपने पास रखता था बल्कि इनका मूल्य भी स्वंय निर्धारित किया करता था। काली मिर्च के व्यापार पर तो इस प्रकार की शाही एकाधिकार प्रणाली चलाई जा सकती थी क्योंकि उसकी मांग बेलोच  और स्थिर थी परंतु कपड़े इत्यादि अन्य वस्तुओं पर यह व्यवस्था लादना कठिन था । इसी कारण पुर्तगाली व्यापार तो सीमित रहा जबकि डच व्यापार में विविध प्रकार की वस्तुओ की सूची बढ़ती गई । 

Posted on by