इलाहाबाद की संधि में दीवानी को निज़ामत से अलग करने की व्यवस्था द्वारा दोहरी शासन व्यवस्था या द्वैध शासन प्रणाली का सूत्रपात हुआ। किंतु यह केवल सिद्धांत में ही था। व्यवहार में बंगाल के नवाब के नायब को मनोनीत करने के अधिकार के माध्यम से कंपनी का दीवानी तथा निजामत अर्थात् पुलिस तथा न्यायिक शक्तियाँ पर भी नियंत्रण हो गया।
इस प्रकार कंपनी वास्तविक शासक बन गई और नाजिम व दीवान-दोनो केे ही अधिकारो काा उपभोग करने लगी। यद्यपि दीवानी से अभिप्राय प्रशासनिक उत्तरदायित्वो का पालन करना था, किंतु क्लाइव ऐसा कोई भी उत्तरदायित्व नहीं लेना चाहता था। इसलिए उसने एक ही व्यक्ति में नायब नाजिम तथा दीवान के पदो के दायित्वों को सन्निहित कर दिया। इस पद पर मुहम्मद रजा खाँ को बंगाल व शिताब राय को बिहार में नियुक्त किया गया। संक्षेप मेेें कहा जाता है कि यद्यपि सिद्धांत रूप में निजामत को दीवानी से अलग कर दिया गया था किंतु वास्तव मेेें दोनों ही अधिकार कंंपनी मेेें ही निहित थे ।
प्रश्न यह उठता है कि क्लाइव दीवानी पद से संलग्न प्रशासनिक उत्तरदायित्व को लेने को क्यों नहीं तैयार था। इसके कारण निम्न थे -
देशी शक्तियों का ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध होने का भय था ।
कंपनी को डर था कि बंगाल में सार्वजनिक दायित्वों को लेने से देश के अन्य भागों में अंग्रेजों के इरादे पर शक हो जाएगा तथा उस स्थिति में यूरोपीय शाक्तिया स्थानीय शाक्तियो से मिल जाएगी व शाक्ति संतुलन अंग्रेजोंं के पक्ष मेेें नही रहेेगा।