समावेशी विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वित्तीय समावेशन एक महत्वपूर्ण पहलू है।
रिजर्व बैंक के अनुसार वित्तीय समावेशन का अर्थ है अल्प आय तथा कमजोर वर्ग के लोगों,जो कि सामान्य रूप से बैंकिंग प्रणाली से अपरिचित हैं तथा बैंकिंग सेवाओं का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं, को वहनीय लागत पर बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराना।
ऐसे लोग जो बैंकिंग सेवाओं से अपरिचित हैं; गांव में साहूकारों, महाजनो से ऊंची ब्याज दर पर ऋण लेते हैं तथा अंततः ऋण जाल (Debt Trap) मैं फंस जाते हैं, उन तक बैंकिंग सेवाएं पहुंचाना।
भारत में वित्तीय समावेशन की मांग वर्ष 2005 के बाद ज्यादा तेज हुई । परंतु इसके पूर्व भी बैंकों का राष्ट्रीयकरण प्राथमिक क्षेत्र ऋण दान कार्यक्रम, स्वयं सहायता समूहो की शुरुआत आदि लोगों तक आसान वित्तीय पहुंच के उद्देश्य से ही शुरू किया गया था।
वित्तीय समावेशन के लिए -
तीन प्रमुख बातों का होना आवश्यक है -
1-देश के सभी भागों विशेषकर पिछड़े इलाकों में बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध होना।
2-लोगों को बैंकिंग प्रणाली से परिचित कराना तथा अधिक से अधिक लोगों को बैंकों में खाता खोलने हेतु प्रेरित करना।
3 - पिछड़े इलाकों में लोगों को वहनीय तथा न्यूनतम लागत पर ऋण प्रदान करना जिससे लोगों को महाजनो और साहूकारों के पास जाने के लिए जरूरत ना पड़े और वह उनके चंगुल में न फंसे।