समास/COMPOUND का शेष भाग।

        3. द्वंद समास:-

जिसके दोनों पद प्रधान हों, दोनों संख्याएं अथवा विशेषण हो, वह द्वंद समासे कहलाएगा। इसका विग्रह करने के लिए दो पदों के बीच 'और' अथवा 'या' जैसे योजक अव्यय लिखा जाता है। जैसे-

रात-दिन          रात और दिन, रात या दिन

सीता-राम         सीता और राम

द्वंद द्वंद समास के भेद:-

क. इतरेतर द्वंद:-

इस द्वंद समास के दोनों पदों के बीच 'और','तथा' आदि योजक शब्दों का लोप होता है, अर्थात इस समाज में समान महत्व के दो शब्द 'और', 'तथा' आदि योजक शब्दों से जुड़े होते हैं। जैसे-

राम-लक्ष्मण               राम और लक्ष्मण

पाप-पुण्य                  पाप और पुण्य

      . समाहार द्वंद्व- 

जिस द्वंद समास से उसके पदों के अर्थ के अतिरिक्त उसी प्रकार के अन्य अर्थ का भी ज्ञान होता है उसे समाहार द्वंद्व कहते हैं। जैसे-

रोटी-दाल         भोजन के सभी प्रमुख पदार्थ के अर्थ में

अन्न-जल         संपूर्ण भोजन के अर्थ में

        . वैकल्पिक द्वंद्व:-

जहां दोनों पदों के बीच 'या','अथवा' विकल्प- सूचक योजक शब्दों का लोक पाया जाता है। अर्थात वैकल्पिक द्वंद्व समास दो विरोधी भावों के बोधक शब्दों के मेल से बनता है, जैसे-

भला-बुरा           भला या बुरा

           4. बहुव्रीहि समास

इस समास में कोई भी शब्द प्रधान नहीं होता; दोनों शब्द मिलाकर एक नया अर्थ प्रकट करते हैं जैसे- पीतांबर। इसके दो पद हैं- पीत+अम्बर। पहला विशेषण और दूसरा संज्ञा। अतः इसे कर्मधारय समास होना चाहिए था परंतु एक बहुव्रीहि में पीताम्बर का विशेष अर्थ 'पीत वस्त्र धारण करने वाले श्रीकृष्ण' से लिया जाएगा जैसे-

  दशानन         दश हैं आनन जिसके अर्थात रावण

जलज             जल में उत्पन्न होता है जो अर्थात कमल

                  लेख पूर्ण हुआ.....

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