पूर्व मध्यकाल-1 हर्षवर्धन

हर्षवर्धन

      हर्षवर्धन 606ई0 में राजगद्दी पर बैठा था। हर्षवर्धन का राजकवि बाणभट्ट था उसने हर्षचरित्र की रचना की। बाणभट्ट की एक अन्य रचना कादम्बरी है। ़

      हर्षवर्धन ने नागानन्द, रत्नावली और प्रियदर्शिका नामक नाटक की रचना की।

      चीनी यात्री ह्वेनसांग हर्ष के दरबार में आया था।

      ह्वेनसांग को यात्रियोें का राजकुमार कहा जाता था।

      हर्षवर्धन बादामी के चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय से नर्मदा नदी के तट पर पराजित हुआ था। 

      हर्ष ने 634 ई0 मंे कन्नौज तथा प्रयाग में दो धार्मिक सभाओ का आयोजन किया था। कन्नौज महासभा की अध्यक्षता चीनी यात्री ह्वेनसांग ने की।

      हर्ष ने प्रयाग में महामोक्ष परिषद का आयोजन किया था।

      साधारण सैनिकों को ‘चाट एव भाट’ कहा जाता था।

दक्षिण भारत

      पल्लव वंश का संस्थापक सिंहविष्णु था इसकी राजधानी काँची थी।

      मतविलास प्रहसन की रचना महेन्द्र वर्मन ने की थी।

      महाबलीपुरम् के एकाश्मक मन्दिरों का निर्माण नरसिंह वर्मन प्रथम द्वारा करवाया गया था। इन मन्दिरों को रथ मन्दिर या सप्तपैगोड़ा भी कहा जाता है।

      नरसिंह वर्मन प्रथम ने वातापी कोन्ड की उपाधि धारण की थी।

      राष्ट्रकूट राजवंश की स्थापना दन्ति दुर्ग ने की थी। राष्ट्रकूटों की राजधानी मान्यखेत में थी।

      एलोरा के प्रसिद्व कैलाश मन्दिर का निर्माण राष्टकूट नरेश कृष्ण प्रथम ने करवाया था।

      अमोघवर्ष जैन धर्म का अनुयायी था।

      उसने कन्नड़ भाषा मंे कविराज मार्ग की रचना की। 

      राष्ट्रकूट शासक इन्द्र तृतीय के शासन काल में अरब यात्री अलमसूदी भारत आया था।

      महाराष्ट्र में औरंगाबाद के समीप एलोरा से बौद्ध, हिन्दू तथा जैन तीनो धर्मो से सम्बन्धित गुफाये प्राप्त हुयी है।

      कल्याणी के चालुक्य वंश की स्थापना तैलप द्वितीय ने की थी।

      विल्हण एवं विज्ञानेश्वर विक्रमादित्य शष्ठ के दरबार में रहते थे।

      हिन्दू विधि ग्रन्थ मिताक्षरा की रचना विज्ञानेश्वर ने की थी।

      जय सिंह ने वातापी के चालुक्य वंश की स्थापना की थी।

      इस वंश का प्रतापी राजा पुलेकेशिन द्वितीय था।

      इसने हर्षवर्धन को हराकर परमेश्वर की उपाधि धारण की थी।

      इसने दक्षिणापथेश्वर की उपाधि धारण की थी।

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