चोल
वीर राजेन्द्र ने राजकेसरी की उपाधि धारण की थी।
सम्पूर्ण चोल साम्राज्य 6 प्रान्तों में विभाजित था, प्रान्त को मंडलम् कहा जाता था।
अवरोही क्रम में (घटते हुए क्रम मेेें) चोल सम्राज्य की प्रशासनिक इकाइयाँ थी-राज्य, मंडलम्, वलनाडु, नाडु, कुर्रम या कोटट्म, ग्राम।
चोल प्रशासन में ग्रामांे के समूह को कुर्रम या कोट्टम कहा जाता था।
ग्रामों में स्थानीय स्वशासन चोल प्रशासन की मुख्य विशेषता थी।
उर सर्वसाधारण लोगों की ग्राम सभा थी।
सभा या महासभा अग्रहारों और ब्राह्मण बस्तियों की सभा थी-इसके सदस्यों को पेरूमक्कल् कहा जाता था।
व्यापारियों की सभा को नगरम कहते थे।
चोल काल में भूमिकर उपज का 1/3 भाग लिया जाता था।
ब्राह्मणों को कर मुक्त दी गयी भूमि को चर्तुर्वेदि मंगलम कहा जाता था।
सोने के सिक्के को काशु कहते थें।
ब्राह्मणों को दान दी गयी भूमि को ब्रहमदेय कहा जाता था।
विष्णु के उपासक आलवर एवं शिव के उपासक नायनार कहलाते थें।
देवगिरी के यादव वंश की स्थापना भिल्लम ने की थी।
इस वंश का अन्तिम स्वतन्त्र शासक रामचन्द्रराय था।
जिसको अलाउद्दीन खिल्जी के सेनापति मलिक काफूर ने पराजित कर आत्मसमर्पण के लिए विवश किया था।
द्वारसमुद्र के होयसल वंश की स्थापना विष्णुवर्धन ने की थी।
इस वंश के शसक वीरबल्लाल तृतीय को मलिक काफूर ने हराया था।
होयसल वंश की राजधानी द्वारसमुद्र थी जिसकी पहचान आज कर्नाटक राज्य में आधुनिक हेलेबिड नामक स्थान से की जाती है।
कदम्ब वंश की स्थापना मयूरशर्मन ने की थी। वनवासी इसकी राजधानी थी।