राजा राममोहन राय धर्म के प्रति बौद्घिक दृष्टिकोण अपनाने के पक्षधार थे। इस्लाम के एकेश्वरवाद तथा मूर्ति पूजा विरोध, सूफीमत, ईसाई धर्म की नैतिक शिक्षाओं, पश्चिम के उत्तराधिकारवादी तथा बौद्घिक सिद्धांतों का उन पर गहन प्रभाव पड़ा। उन्होंने सभी धर्मों तथा मानवता के लिए एक ही ईश्वर के मत के लिए प्रतिपादन किया।
हिन्दू धर्म के एकेश्वरवादी मत का प्रचार करने के लिए उन्होंने आत्मीय सभा (1815-19) की स्थापना की। 1828 में उन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की, जो बाद में ब्रह्म समाज के रूप में प्रचलित हुआ। इस नवीन पंथ में सामाजिक रीति - रिवाजों एवं धार्मिक कर्मकांडो के लिए कोई स्थान नहीं था। यह एकेश्वरवादियों का समाज था। समाज के सिद्धांतों को न्यास के दस्तावेजों तथा तत्कालीन प्रकाशित पुस्तिका में परिभाषित किया गया। ब्रह्म समाज का विश्वास था कि जो कुछ भी दृश्यमान जगत में अस्तित्ववान है, उन सबका कारण तथा प्रेरणा स्त्रोत ईश्वर है। सभी प्रकार प्रकृति, पृथ्वी और स्वर्ग सभी उस ईश्वर की ही सृष्टि है। इनके यहां ईश्वर की अवधारणा में अवतार तथा ध्यान जैसे विचारों के लिए कोई स्थान नहीं है। वह ईश्वर तथा जीव ( मनुष्य ) के बीच मध्यस्थ की सत्ता स्वीकार नहीं करते। ब्रह्म समाज में न तो बली चढ़ाने की अनुमति थी न मूर्ति पूजा का समर्थन किया गया।