केशवचन्द्र सेन की महाराष्ट्र यात्रा के परिणामस्वरूप 1867 में यहां प्रार्थना समाज की स्थापना हुई। इसके संस्थापक डॉ. आत्माराम पांडुरंग एवं महादेव गोविन्द रानाडे थे। रानाडे का उल्लेख " पश्चिमी भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण के अग्रदूत" के रूप में किया जाता है। आर. जी. भंडारकर इसके प्रमुख नेता थे। उपासना और सामाजिक सुधार इस समाज के दो मुख्य अंग थे। रानाडे ने स्पष्ट किया कि अधिकांश विद्यमान कुरीतियां प्राचीन प्रथाओं एवं विश्वासों के प्रतिकूल हैं। उन्होंने इस संबंध में स्त्रियों की परतंत्र स्थिति, बाल विवाह, स्त्रियों की अशिक्षा और उपेक्षा, विदेश यात्रा का निषेध, स्त्रियों पर लगाई गई विभिन्न प्रकार की वर्जनाओं, अंतर्जातीय के बीच खान - पान पर प्रतिबंध तथा छुआछूत आदि का विरोध किया। रानाडे ने शुद्धि आन्दोलन भी प्रारंभ किया, जिसमें (वैश्यों द्वारा ) नृत्य और मद्यपान विरोधी तथा विवाह में होने वाले फिजूलखर्ची के विरूद्ध आंदोलन चलाए गए। रानाडे के आंदोलन ने शीघ्र ही अखिल भारतीय स्वरूप धारण कर लिया।
रानाडे की हिन्दू धर्म में अत्यधिक निष्ठा थी, लेकिन उनका धर्म आधुनिक ईश्वरवादी दर्शन के आलोक से मंडित तथा कुरीति और संकीर्णताओं से मुक्त था। इन्होंने आस्तिकता संबंधी अपने विचारों को 39 अनुच्छेदों में संकलित अपनी पुस्तक " एक आस्तिक की धर्म में आस्था " में प्रस्तुत किया। रानाडे के धर्म और समाज संबंधी विचार पश्चिमी विचारधारा से गंभीर रूप से प्रभावित थे।