इतिहास लेखन की परम्परा

बहूत से विदेशी विद्वानों का मत था कि भारतीयों में इतिहास लेखन की कोई समझ नहीं थी । जो कुछ भी लिखा गया वह भारत के इतिहास को लिखने का प्रयास यूनानी शासकों द्वारा किया गया।

इसमे सर्वाधिक उल्लेखनीय कार्य हेरोडोटस ,मेगस्थनीज ,  नियारकस ,एरियन ,एस्ट्रबो तथा किलनी द्वारा किया गया । हेरोडोटस ने ही हिस्टोरिका  नामक पुस्तक लिखी जिससे इतिहास का जन्म हुआ है ।

हैरोडोट्स को ही इतिहास का पिता कहा जाता है ।

 इतिहास लेखन का द्वितीय चरण अलबरुनी  से शुरू होता है । जिसने संस्कृत भाषा का अध्ययन किया था और भारतीय  स्रोतों का सही सही ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश किया । उसने किताबुल-हिंद  या तहकी-के-हिंद नामक महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी है । और इस पुस्तक में बताया कि हिंदू लोग समझते हैं कि उनके देश जैसा कोई देश नहीं ,  उनके धर्म जैसा कोई धर्म नहीं , उनके विज्ञान जैसा कोई विज्ञान नहीं , उनके राजा जैसा कोई राजा नहीं है । 

   सर विलियम जोंस ने  1784 में एशियाटिक सोसाइटी आफ बंगाल की स्थापना किया तथा भारतीय इतिहास को अपने तरीक़े से लिखने का प्रयास किया ।यूरोपीय इतिहासकारों द्वारा इतिहास लिखने का प्रमुख उद्देश्य उपनिवेश को स्थापित करना था। जिसमें विलियम जोन्स, मैक्समूलर ,जे॰एस॰ मिल०, एफ़डब्लू हीगल जैसे लोगों ने भारत का इतिहास लिखा ।

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