प्राचीन भारतीय संस्कृति और कला को समझने के लिए अंग्रेजोें ने अतीत की खोज का काम आरम्भ किया।
भारत में प्रागैतिहासिक चित्रों की खोज का श्रेय जानकाकवर्ण तथा आर्चबोल्ड कार्लाइल को प्राप्त है।
इन दोनों ने मिलकर 1880 ई0 में विन्ध क्षेत्र में मिर्जापुर के निकट कैमूर की पहाड़ियों की गुफाओं में बारहसिंहा,सांभर,गैडे के आखेट के दृश्य (चित्र) प्राप्त किये।
नोट:− भारत में सर्वप्रथम 1863 ई0 में ब्रुसफुट ने प्रस्तर युग के औजारों की खोज मद्रास के समीप पल्लवरम् नामक स्थान में की थी। पहला प्रागैतिहासिक उपकरण विदारिणी (कुल्हाड़ी) था।
दक्षिण भारत का क्षेत्र सबसे प्राचीन माना जाता है। इस समय का मनुष्य क्वार्टीजाइट मनुष्य के नाम से जाना जाता था। बेलारी (कर्नाटक) दक्षिण भारत इसका प्रधान केन्द्र था।
मानव के प्रागैतिहासिक चित्रों में रेखाओं और आकारों के द्वारा उसकी प्रगति का इतिहास प्राप्त होता है। साथ ही साथ उसकी कलात्मक अभिरूचि पर प्रकाश पड़ता है। इन्हीं असंख्य प्रागैतिहासिक चित्र आकृतियों के अवशेषों के आधार पर आज कला की सटीक परिभाषा सम्भव हो सकी है।
परिभाषा:− किसी समतल धरातल,जैसे काष्ट फलक, भित्ति फलक आदि पर रंग तथा रेखाओं की सहायता से लम्बाई,चैड़ाई,गोलाई तथा ऊँचाई को अंकित कर किसी रूप का आभास करना ही चित्रकला है।