नव−पाषाणकाल

    नव−पाषाणकाल :‌-10000ई0पू0-3000 ई0पू0 तकद्ध:- पुरापाषाण काल में मानव की जीविका का स्रोत केवल आखेट एंव खाद्यय संग्रह था। मघ्य पाषाण काल में उसने इसमें पशुपालन का भी योग कर लिया।
    नव पाषणकाल में पशुपालन और विकसित हुआ तथा कृषि भी मानव ने आरम्भ कर दिया। 
    कृषि के कारण अधिशेष पैदा होने लगा,जिससे मानव को अतिरिक्त समय मिला। यही कारण है,कि मानव की कलात्मक गतिविधियों का नियमित साक्ष्य नव पाषाण काल में मिलना आरम्भ होता है। 
    कलात्मक मृदभाण्डों का प्रयोग,गाड़ी का प्रयोग,परिवार बनाने,और गाँव बसाने का श्रेय भी इसी चरण के मानव को प्राप्त है। 
    चाक पर बने कलात्मक एंव चित्रांकित मृदभण्डों का प्रयोग करने का पहला श्रेय इन्हीं को दिया जाता है। 
    नर्मदा नदी घाटी में एक गोल यंत्र,दरियायी घोेड़े की हड्डियाँ,कुछ अन्य पशुओं की हड्डियाँ,हिरौंजी के टुकड़े तथा कुछ सिरनुमा पत्थर प्राप्त हुए है। 
    जहाॅ पुरापाषाण कालीन मानव कुड़प्पा और मद्रास सिटी तक ही सीमित रहा,वहीं नव पाषाण काल का मानव पूरे भारत में फैल गया। लेकिन बेलारी इसका प्रधान केन्द्र था।
    नव−पाषाण कालीन कला के साक्ष्य:− नव पाषाण कालीन चित्रकला के साक्ष्य मध्य-प्रदेश, उत्तर-प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, आन्ध्र-प्रदेश, उड़ीसा, छोटा नागपुर से प्राप्त हुए है। साथ ही साथ बिहार एवं राजस्थान से भी साक्ष्य मिले है। 
    इसके अध्ययन से न केवल तत्कालीन मानव के चित्रकला के ज्ञान का आभास होता है। साथ ही मानव के विकास की भी जानकारी मिलती है। 
1.    ल्योनार्ड एड्म- प्री हिस्टोरी आर्ट आॅफ इंडिया-1940 ई0 
2.    स्टुअर्ट पिग्गट-प्री हिस्टोरिक इंडिया-1950 ई0
3.    ए0एच0 ब्राड्रिक-प्री हिस्टोरिक पेंटिग-1958 ई0 
4.    असित कुमार हाल्दार-अवर हेरिटेज इन आर्ट से- प्रागैतिहासिक चित्रकला के पर्याप्त एवं प्रमाणिक जानकारी मिल जाती है।
 
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