धारणीय व स्थाई विकास(sustainable development)।

सतत्/निर्वहनीय /निरंतर अथवा स्थाई विकास शब्द का प्रयोग पहली बार IUCN (International Union for conservation of nature and natural resources) ने अपनी रिपोर्ट 'विश्व संरक्षण रणनीति' में किया था । 1987 में WCED( world Commission on environment and development) नें 'our common future' नामक रिपोर्ट में इस शब्द की परिभाषााा और कार्य पद्धति की व्याख्या की; जिसे UNO ने स्वीकार कर लिया है। इस रिपोर्ट के अनुसार धारणीय अथवा स्थाई विकास वह विकास है जिसके अंतर्गत भावी पीढ़ियों के लिए आवश्यकताओं की पूर्ति करने की क्षमताओं से समझौता किए बिना वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा किया जाता है। अतः पर्यावरण की सुरक्षा के बिना विकास कोो निर्हवनीय नहींंं बनाया जा सकता । आर्थिक विकास में पर्यावरण सुरक्षा के मध्य एक वांछित संतुलन बनाए रखना ही निर्वहनीय या टिकाऊ विकास है। 

          इसके पश्चात पूंजी कुशल श्रमिक एवं तकनीकी आदि के प्रयोग के बावजूद यदि अधिकतम विकास का प्रयास कियाााााा जाए तो पर्यावरण को स्थायी रूप से क्षति पहुंचने लगती है। इस प्रकार विकास का यह स्तर लंबे समय तक नहीं चल सकताा । सतत् विकास की इस अवधारणा में पर्यावरण के अनुरूप विकास के साथ ही प्राकृतिक संसाधनों को भावी पीढ़ियों के लिए बचाए रखने पर भी ध्यान रखा जाता है। वर्तमान में धारणीय विकास एक भूमंडलीय दृष्टिकोण बन गया है। 1992 के पृथ्वी सम्मेलन में घोषित एजेंडा 21 (रियो घोषणा) में इसके प्रति पूर्ण समर्थन व्यक्त्त किया गया। 2002 ईस्वी केे जोहांसबर्ग सम्मेलन (रियो + 10) का मूल मुद्दा ही सतत् विकास था। ज्ञात रहे, कि प्रथम पृथ्वी शिखर सम्मेलन (1992) के 20 वर्ष पूरे होने के पश्चात वर्ष 2012 में ब्राजील केे Rio de generio में रियो 20 सम्मेलन का आयोजन किया गया था, जिसके घोषणा पत्र का शीर्षक '' द फ्यूचर वी वांट' था । इस सम्मेलन में भारत ने हरित अर्थव्यवस्था (green economy)  को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर बल दिया था।

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