हडप्पा/सिंधुहडप्पा/सिंधु सभ्यता की कला (3250-2750 ई0 पूर्व)  धातु की मूर्तियाँ

    धातु की मूर्तियाँ− सिंधु घाटी के मूर्तिकार धातुओं के संयोग से मिश्रित धातु बनाने की कला में पारंगत थे।
    मोहन जोदड़ो,चान्हूदड़ो,लोथल तथा कालीबंगा से कांस्य धातु की मूर्तियाँ अभी तक मिली है। मोहन जोदड़ो से प्राप्त मूर्तियाँ बन्द साँचे में ढाल कर बनायी गयी थी।
    मोहन जोदड़ो से प्राप्त 12सेमी0 लम्बी नर्तकी की कांस्य मूर्ति विश्व विख्यात है।
    इसकी कमनीय देहयष्टि तथा नारी सुलभ मुस्कान उल्लेखनीय है। इस युवती का कंधे से कलाई तक चूड़ियों से भरा हुआ वाया हाथ आगे को झुके वायें घुटने पर टिका हुआ है।
    वाजूबन्द तथा कलाई में दो-दो चूड़ियों से युक्त दाहिना हाथ कटि (कमर) पर अवलम्बित है। गले में उसके एक कण्ठहार है जिसमें तीन लटकने है। आभूषणों को छोड़कर मूर्ति बिलकुल नग्न है।
    इस कांस्य मूर्ति की सहज भंगिमा भाव चेष्टा,अंग-प्रत्यंगों की अविराम भंगिमायें सब नृत्य की सूचक है।
    मोहन जोदड़ो से प्राप्त दूसरी नारी कांस्य मूर्ति कलात्मक दृष्टि से सामान्य कोटि की है।
    कांस्य धातु की पशुमूर्तियाँ तथा मुहरें भी मिली है। मोहन जोदड़ो से उपलब्ध कांस्य की सजीव पशु-मूर्तियों में भैसा और भेड़ा की मूर्तियाँ है।
    चान्हूदड़ो से प्राप्त बैलगाड़ी तथा इक्कागाड़ी उल्लेखनीय है। 
    काली बंगा से प्राप्त ताँबे की वृषभ मूर्ति अपने आप में अनोखी है।
    लोथल से उपलब्ध बैल,कुत्ता,खरगोश और चिड़ियाँ की ताँबे की मूर्तियों में से कुत्ते की मूर्ति कलात्मक दृष्टि से सुन्दर कही जा सकती है।
    ताँबे की जो कतिपय मुहरें मिली है, उन पर हाथी, गैड़ा, बैल तथा बाघ आदि के चित्र बने हुए है।
 
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