बौद्धकाल की चित्रकला  (50-700ई0 तक) 

                  बौद्धकाल की चित्रकला  (50-700ई0 तक) 

    बौद्ध धर्म के अनुयायियों ने जो धनी एंव व्यापारी वर्ग के थे, अनेकों विहारों एंव स्तूयों का निर्माण करवाया। जैसे मध्य प्रदेश में साँची एंव भरहुत दक्षिण में अमरावती एंव नागार्जुन कोण्डा तथा पश्चिम में कार्ले एंव भंज।
    सारनाथ का सिंह स्तम्भ तथा रमपुरवा का पाषाण निर्मित वृषभ मौर्यकालीन कला की प्रमुख अभिव्यक्तियाँ है।
    बौद्ध कला के इतिहासकार तारानाथ ने बौद्ध चित्रकला की तीन शैली का वर्णन किया है-
    देव शैली- यह शैली मध्यदेशीय शैली थी, जिसके संस्थापक आचार्य विम्बसार थे। इसका केन्द्र मगध में था।
    यक्ष शैली- यह शैली सम्राट अशोक के काल में प्रचलित थी, जिसका केन्द्र राजपुताना था। इस केन्द्र के मुख्य चित्रकार आचार्य श्रृंगीधर थे।
    नाग शैली- यह शैली आचार्य नागार्जुन के समय रही। इसका केन्द्र बंगाल था। इस केन्द्र के प्रमुख चित्रकार धीमान और उसका पुत्र वित्तपाल था।
    भारत में बौद्ध कला की विरासत भित्त-चित्रों के रूप में सुरक्षित है, जो महात्मा बुद्ध के जीवन की घटनाओं तथा जातक कथाओं पर आधारित है।
    श्रीलंका में सिंगिरिया की गुफाओं, भारत में बाघ तथा सित्तनवासल के चित्रों में अजन्ता के गुफा चित्रों की छाप मिलती है।
    नोट:− इन तीन प्रमुख केन्द्रों के अतिरिक्त-कश्मीर, नेपाल, वर्मा और दक्षिण भारत आदि में बौद्ध चित्रकला के अनेक केन्द्र थे, जिनका समय छठी शताब्दी से दसवीं शताब्दी था।
 

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