राष्ट्रीय आन्दोलन के लक्ष्यों और तरीक़ों को प्रभावित करने और बदलने में बंगाल के विभाजन ने सबसे प्रभावकारी भूमिका अदा की। उस समय बंगाल भारत का सबसे बड़ा प्रांत था ,जिसमें संपूर्ण बिहार और उड़ीसा के हिस्से शामिल थे । उस समय बंगाल की आबादी 7 करोड़ 80 लाख थी । कहा जा रहा था कि इतने बड़े प्रांत के प्रशासन को संभालना कठिन है इसलिए इसका विभाजन आवश्यक है ।
बंगाल में राष्ट्रीय आन्दोलन बड़ा मज़बूत था । ब्रिटिश शासकों ने सोचा की प्रांत का विभाजन करके वे इस आन्दोलन को कमज़ोर बनाने में सफल हो जाएंगे । तथा अंग्रेजो का दूसरा उद्देश्य था हिन्दुओं और मुसलमानों में फूट पैदा करना ।वे कहने लगे की नए प्रांत में मुसलमानों का बहुमत होगा इसलिए यह उनके हित में होगा। अंग्रेजों का विचार था कि इस तरह से वे मुसलमानों को राष्ट्रीय आंदोलन से अलग करने में सफल होंगे । २०जुलाई १९०४ईसा पूर्व को बंगाल विभाजन के निर्णय की घोषणा हुई जिसके परिणामस्वरूप ७ अगस्त 19 सौ पाँच ईसा पूर्व को टाउनहाल में स्वदेशी आन्दोलन का आरंभ हुआ ।
१६ अक्टूबर 1905 ईसा पूर्व को बंगाल कर्ज़न की घोषणा के साथ ही विभाजन प्रभावी हो गया। इसके विरोध में हुए आंदोलन को बग भंग विरोधी आन्दोलन के नाम से जाना जाता है ।विभाजन के अंतरगत बंगाल के पूर्वी हिस्सों को अलग करके असम के साथ मिला दिया गया इस प्रकार पूर्वी बंगाल और असम का नया प्रांत बना। १६ अकटूबर १९०५ ई० को विभाजन को कार्य रूप दिया गया ।