1972 से प्रभावी भारतीय पेटेंट अधिनियम, 1970 पेटंट प्रणाली के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ है। इसने ना केवल अत्यधिक संवेदनशील और सामाजिक रुप से प्रासंगिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में उत्पाद पेटंट प्रदान पर रोक लगाई बनके प्रक्रिया पेटेंट की वैधता अवधि को दाखिल की तिथि से 7 साल में सीलिंग की तिथि से 5 साल तक के लिए सीमित कर दिया।
जो कि एक नई औषधि को खोजने एवं विकसित करने में 10 साल से कम समय नहीं लगता है । ऐसे में प्रक्रिया की वैधता की अवधि अवधि 10 साल से कम है, तो इसका कोई मतलब नहीं रह जाता । भारतीय पेटेंट प्रणाली में इस तरह के क्रांतिकारी परिवर्तन के परिणाम स्वरुप भारतीय उद्योगों की प्रकृति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला।
IPR 1970 और FERA ने विदेशी कंपनियों को प्रतिकूल तरीके से प्रभावित किया । और अब केवल ऐसी विदेशी कंपनियां भारत में निवेश कर सकती हैं, जो किसी भारतीय कंपनी के साथ अधिकतम 40% की हिस्सेदारी के साथ संयुक्त उद्यम करने को तैयार हों।
यदि आज भारत उच्च गुणवत्ता युक्त जेनेरिक दवाओं के उत्पादन में एक नेतृत्वकर्ता की भूमिका में है, तो इसका श्रेय भारत के महत्वपूर्ण पेटंट एवं औद्योगिक कानूनों को जाना चाहिए । बाजार हेतु स्वदेश निर्मित पेटेंट युक्त उत्पादों की आपूर्ति के अलावा भारत ने इन उत्पादों को ऐसे देशों में निर्यात करना प्रारंभ कर दिया है। जहां कोई वैध पेटेंट कानून नहीं है।