सुभाष बोस को 1938 ई. में सर्वसम्मति से कांग्रेस के हरिपुरा सम्मेलन के लिए अध्यक्ष चुना गया। उन्होंने 1939 में पुनः अध्यक्ष पर की दावेदारी यह कहते हुए कर दी कि कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में वह नई विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस बार कांग्रेस का गैर वामपंथी गुट उनके विरूद्ध हो गया। इस गुट में कृपलानी, राजेन्द्र प्रसाद तथा सरदार पटेल थे तथा इन्हे गांधी जी का समर्थन प्राप्त था। दक्षिणपंथी गुट ने पहले मौलाना कलाम को उम्मीदवार बनाया परन्तु उनके इंकार करने पर पट्टभिसीतारमैया को उम्मीदवार बनाया गया। गांधीजी की इसमें सहमति थी परन्तु अध्यक्षीय चुनाव में सुभाष बोस ने सीतारमैया को 1377 के मुकाबले 1580 मतों से पराजित कर दिया। गांधीजी ने इस स्थिति से दुखी होकर कहा कि सीतारमैया की हार मेरी हार है। अंततः कांग्रेस कार्यकारिणी के अधिकांश सदस्यों ने सुभाष के साथ जाने से मना कर दिया। इसकी वजह से सुभाष चन्द्र बोस ने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया तथा राजेन्द्र प्रसाद को अध्यक्ष बनाया गया। इसके कुछ ही दिनों के पश्चात कांग्रेस की केंद्रीय अनुशासन समिति ने सुभाष को तीन वर्षों के लिए कांग्रेस से निष्कासित कर दिया।