रजवाड़ों की जनता का संघर्ष

1930 के दशक की एक महत्वपूर्ण घटना यह थी कि राष्ट्रीय आंदोलन का प्रसार रजवाड़ों तक भी फैल गया। अधिकांश रजवाड़ों ने आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक परिस्थितियों नरक से भी बदतर थी। रजवाड़ों की आय का बहुत बड़ा भाग राजा और उसके परिवारों के भोग - विलास पर खर्च होता था। पूर्व के इतिहास में आंतरिक विद्रोह या बाहरी आक्रमण की चुनौतियां इन भ्रष्ट और पतित राजा - महाराजाओं की मनमानी पर कुछ हद तक नियंत्रण रखती थी। परन्तु ब्रिटिश शासन ने राजाओं को इन दोनों खतरों से सुरक्षित बना दिया और वे अब खुलकर शासन का दुरुपयोग करने लगे।

ब्रिटिश अधिकारी भी अब एकता के विकास में बाधा डालने तथा उदीयमान राष्ट्रीय आंदोलन का मुकाबला करने के लिए राजाओं का इस्तेमाल करने लगे। देशी राजा भी जन - विद्रोह के आगे अपनी सुरक्षा के लिए ब्रिटिश सत्ता पर निर्भर थे और उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति दुश्मनी का रवैया अपनाया।

चेंबर ऑफ प्रिंसेज - 1921 में चेंबर ऑफ प्रिंसेज की स्थापना इसलिए की गई ताकि महाराजे आपस में मिल बैठ कर ब्रिटिश मार्ग दर्शन में अपने साझे हित के विषयों पर विचार कर सकें। भारत सरकार कानून, 1935 में भी प्रस्तावित संघीय ढांचे की योजना इस प्रकार रखी गई थी कि राष्ट्रवादी शक्तियों का नियंत्रण बना रहे। इसमें यह व्यवस्था भी थी कि निचले सदन में कुल सीटों के 1/3 भाग तथा ऊपरी सदन में कुल सीटों के 2/5 भाग पर रजवाड़ों का प्रतिनिधित्व रहेगा।

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